बरगद के पेड़ के नीचे भूत - भाग 6 | रूह का सौदा | हिंदी हॉरर स्टोरी | अधवंशिका

 1. बरगद के नीचे अधवंशिका का प्रकट होना



हवा में वो खुशबू फैली थी मगर वो खुशबू फूलों की नहीं, सदियों पुरानी सड़ी लकड़ी और गीली कब्र की मिट्टी की थी।


और तभी बरगद के तने के अंदर से आवाज आई और वो आवाज ने एसा कहा -  कामिनी अब तुम नीचे उतरो तुम्हारा "ताप अब पूरा  हुआ। 


कामिनी का पूरा शरीर सुन्न था। घंटों उल्टी लटकी रहने से  सिर नसे सजे  चुकी  थी। आँचल की गांठ खोलते ही वो सीधे जमीन पर गिरी। घुटने छिले, पर चीख नहीं निकली पाई।


सामने जो खड़ा था, वो इंसान नहीं था।


साढ़े सात फुट ऊँचा।  उल्टे पैर। त्वचा - जैसे अंधेरे को खाल बना कर उसमें किसीको रखा गया हो । बाल बरगद की जटाओं में उलझे हुए। और आँखें... एक आँख में आठ रंग, एक साथ जल रहे थे।


जमीन पर उसके कदमों से धुआं निकल रहा था।


कामिनी के गले में सांस अटक गई, पर उसने खुद को काट लिया। अब अब मन ही मन में डरी तो मरी वाली बात हो गई।


उसने दांत भींच कर पूछा 

कामिनी : "कौन हो तुम?"


तने से आवाज आई –"तूने किसे बुलाया है?"


कामिनी - "मैंने सकुची समेत सातों को एक साथ बुलाया है। नाम नहीं लूंगी।"


वो आकृति अब उसके चारों तरफ घूमने लगी।  हर चक्कर पर सूखे पत्ते भंवर बनकर उड़ने लगे। और वो बोली कि –


"हां मैं वही हूँ। सबको मिलाकर एक - अधवंशिका।" आधवंशिका हु मै


2. रूह की कीमत और अंधेरे कोने की शर्त



अधवंशिका रुकी नहीं, घूमते-घूमते ही सौदा कर रही थी।


अधिवांशिका : ये लड़की सुनो "नियम जानती हो? बुलाने के बाद वापस भेजने का कोई रास्ता नहीं है।"


कामिनी : हा मै और सब जानकर ही तुम्हे बुलाया है ।


आध्वंशिका : "तो कीमत सुनो हम दोनों के बीच एक सौदा किया जा रहा है , और इस सौदे में अगर तुम्हे मेरा साथ चाहिए तो इस चीज की कीमत है तुम्हारी रूह तुम्हारी रूह हमारे पास गिरवी रहेंगी जिस3 तुम कभी नहीं छुड़ा सकती इस सौदे का यही उसूल है  ।


एक सेकंड के लिए कामिनी का दिल बैठ गया। सिंह द्वार पर दयावीर का वो मुंह मोड़कर चले जाना आँखों में घूम वही बात घूम रही थी । उसके जहन की ये बात उस दिन का अपमान कामिनी की नजर में रूह भी ज्यादा लगी और उसने इस सौदे को हा कर दिया।


कामिनी : मुझे ये सौदा "मंजूर है।"


अधवंशिका हँसी, और उस हँसी से बरगद की सारी जटाएं एक साथ हिल गईं।


"दूसरी शर्त सुन। तेरे कमरे में एक कोना मेरा होगा। वहाँ हमेशा अंधेरा रहेगा। दिया, मशाल, सूरज की एक लकीर भी वहाँ पड़ी - तो उसी पल मैं तुम्हारी रूह को अपनी दुनिया में  खींच लूंगी हमेशा के लिए। 

कामिनी ने बिना पलक झपकाए कहा - है मुझे हर शर्त "मंजूर है। आज से तुम मेरे गुलाम हो।"


"गांठ पक्की।"


उस एक शब्द के साथ हवा में आठ नाम गूंजे - कटेरी, सकुची, बेताल, बटुला, बटुवा, बौना, ब्रुवुला... और एक जिसे कोई नाम नहीं देता।


वो आठों अब एक शरीर में थे। जिसका नाम था  अधवंशिका।


वो कामिनी के पीछे चल पड़ी। कामिनी को साफ लग रहा था कोई ठीक के पीछे है, गर्दन पर सांस पड़ रही है, पर पीछे देखा तो कोई नहीं था। महल के आंगन में पहुंचकर उसने चाँद की रोशनी में जमीन देखी - उसकी परछाई गायब थी।


3. मोह को भूल जाना और दयावीर पर हमला



अगली सुबह सबसे खतरनाक चीज हुई।


कामिनी भूल गई कि वो क्यों रोई थी।


जिस दयावीर के लिए उसने बरगद पर अपनी जान दांव पर लगाई, भूखी-प्यासी लटकी रही, उसी का चेहरा अब उसे याद ही नहीं आ रहा था। रूह बिकते ही प्यार सबसे पहले मरता  है इस नियम से3 कामिनी अंजान थी जिसे आधावंशिका ने छुपाया था। दिल में अब सिर्फ एक गहरा खाली गड्ढा और उसमें उबलता गुस्सा बौखाल बन कर उमड़ रहा था।


और उस गुस्से ने आदेश दिया - "उसे पागल कर दो।"


रात के ठीक 12 बजे। चिंतामणि महल में सब सो रहे थे। पहरेदार भी घोड़े बेच कर सो रहे थे।


खिड़की की दरार से बिना आवाज के काला धुआं घुसा। सांप की तरह रेंगता हुआ सीधे दयावीर के बिस्तर तक। और उसके माथे पर बैठ गया।


दयावीर नींद में ही तड़पने लगा। माथे की नसें फूल गईं।


सुबह जब कुमारी ने उसे उठाया तो उसकी आँखें खून जैसी लाल थीं। और दयावीर का सवाल बहुत अजीब था उस एक सवाल ने कुमारी को समझा दिया कि कुछ तो हुआ है ।


" कुमारी ने रोते हुए पूछा।"मैं कौन हूँ, जानती हो?


दयावीर ने उसे धक्का दिया - "मैं नहीं जानता तुझे। चल दूर हट।"


उसी पागलपन में उसने तलवार उठाई और चिल्लाया - "वैय्यार पर हमला!"


कुमारी चिल्लाती रह गई, पर वो रुका नहीं। वैय्यार के सिंह द्वार पर पहुंचकर उसके ससुर ने खुद हाथ जोड़कर कहा - "बेटा, तुम दामाद हो, लौट जाओ।"


दयावीर ने तलवार खींच ली। युद्ध हुआ। पर ये युद्ध पहले ही हारा हुआ था। जो योद्धा दस-दस को अकेला मारता था, वो आज वार ही नहीं देख पा रहा था। क्योंकि लड़ाई मैदान में नहीं, उसके दिमाग के अंदर हो रही थी। दो वार में ही वो बंदी बना लिया गया।


4. कुमारी की भीख, माँ का धागा और सूर्य भवन का आदेश



खबर आग की तरह फैली। कुमारी पागलों की तरह दौड़ती हुई वैय्यार पहुंची। अपने ही पिता के सिंहासन के सामने घुटनों पर गिर गई।


"पिताजी, भीख दे दो। मेरा सुहाग लौटा दो। ये मेरे पति नहीं हैं, इन पर किसी चीज का साया है।"


एक राजा के लिए अपनी बेटी को इस हाल में देखना सबसे बड़ी हार थी। उसने उसी पल दयावीर को रिहा कर दिया।


कुमारी उसे लेकर चिंतामणि लौट रही थी, तो रास्ते में सैनिक, दासियां, सब हँस रहे थे - "देखो, योद्धा की पत्नी अपने पति की भीख मांग रही है।"


कुमारी ने सब सुना, पर एक शब्द नहीं बोला।


रास्ते में उसकी बचपन की सखी मिली और कान में फुसफुसाई - "मैंने कामिनी के कमरे के उस अंधेरे कोने में सब सुना है। आठ आत्माएं हैं वहाँ। उसने रूह बेची है।" तुम्हारी बहन ने ही ये सब चल से किया है।


कुमारी ने उस वक्त बहन की ममता में बात टाल दी।


पर जब दयावीर महल पहुंचा, उसकी माता दरवाजे पर ही खड़ी थी। बेटे की हालत देखकर वो चीख पड़ी। उसने तुरंत काली मंदिर से लाया हुआ धागा - जिस पर 21 दिन तक मंत्र पढ़ा गया था - उसके कलाई पर बांध दिया।


धागा बंधते ही दयावीर के शरीर में झटका लगा, जैसे अंदर कुछ चीखा हो। वो थोड़ा शांत हुआ, पर ठीक नहीं हुआ। वो अभी भी कुमारी को घूर रहा था।


अब वैय्यार में कामिनी अपने अंधेरे कोने के सामने बैठी मुस्कुरा रही थी। उसे लग रहा था वो जीत गई।


उधर चिंतामणि में महारानी ने सबको बाहर निकाला और अपने चचेरे भाई को अकेले में बुलाया।और उससे कहा


"भाई, ये आठ आत्माओं का वश है। कोई उपाय नहीं। किसी को कानों-कान खबर नहीं होनी चाहिए। पैरों की आहट भी नहीं। सुबह 4 बजे, सूरज उगने से पहले, सूर्य भवन पहुंच जाओ। वहाँ जो लाठी है, वो बिना आवाज के मारती है। अगर एक भी आहट हुई तो अधवंशिका जाग जाएगी और दयावीर हमेशा के लिए चला जाएगा।"

ध्यान रखना आवाज नहीं ।

अब सबकी सांसें उस चचेरे भाई के कदमों पर टिकी थीं, और उस अंधेरे रास्ते पर जो सूर्य भवन तक जाता था।


आगे की कहानी 5वे भाग में पढ़ेंगे इसके बागी भागों का लिंक्स नचे दे रहा हु क्लिक करके पद सकते है

भाग 1। 

भाग 2

भाग 3

भाग 4

भाग 5


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