चिंतामणि राज्य और राजकुमार दयावीर - भाग 2 | hindi kahaniya

चिंतामणि राज्य और राजकुमार दयावीर - भाग 2



1. घने जंगल का सफर और बहनों के बीच दिल की बात


अपनी बड़ी बहन कामिनी और कुछ खास सखियों को साथ लिया और उसी दिशा में चल पड़ी
अपनी बड़ी बहन कामिनी


वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा था और चिंतामणि तथा वैय्यार राज्य के बीच फैला हुआ वह विशाल, रहस्यमयी घना जंगल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए था। 

एक तरफ राजकुमार दयावीर ने अपने सबसे भरोसेमंद और वीर सैनिकों की एक चुने हुए टोली तैयार की और उस घने जंगल की ओर कदम बढ़ा दिए। उनका उद्देश्य बाहर से भले ही एक साधारण शिकार का प्रतीत हो रहा था, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही थी।

दूसरी ओर, जैसे ही यह खबर हवाओं में तैरती हुई वैय्यार राज्य के महलों तक पहुँची, राजकुंवरि कुमारी का दिल बेचैन हो उठा। उसने बिना एक पल गंवाए अपनी बड़ी बहन कामिनी और कुछ खास सखियों को साथ लिया और उसी दिशा में चल पड़ी। वह भी शिकार के बहाने उस जंगल में उतर आई थी, ताकि किसी तरह अपने सपनों के राजकुमार की एक झलक पा कर राजकुमार को देख  सके।

सफर के दौरान रास्ते में दोनों बहनों के बीच कुछ यूं बातचीत हुई:

कामिनी : सुनो कुमारी, अचानक ये शिकार क्यों? तुम तो कभी किले से बाहर नहीं निकलतीं और आज अचानक शिकार के लिए निकल गईं?

कुमारी : दीदी, बस ऐसे ही। आज पता नहीं क्यों, जंगल देखने का मन किया, तो चलो ऐसे ही टहलते हुए घूम के आते हैं, सोचा बस। इससे ज्यादा और कुछ नहीं है आप अपने मन में कुछ और मठ पालो।

कामिनी : पर तुम तो कभी शिकार नहीं करतीं और आज ऐसा क्यों? पता नहीं मेरा मन नहीं मान रहा है, बताओ क्या माजरा है? मैंने सुना है कि तुम्हारा मन पड़ोसी राज्य के दयावीर पे आया है। बिना एक शब्द भी झूठ कहे सब सच सच बताओ।

कुमारी : आपने सच सुना है दीदी, मुझे उनसे प्यार हो गया है।

कामिनी : सुनो ओ प्यार की दीवानी, बिना देखे प्यार कर बैठी हो, थोड़ा संभल कर कदम उठाना।

कुमारी : नहीं दीदी, वो मेरे ख्यालों में बेहद खूबसूरत हैं। और मैं उन्हें एक तरफा बिन देखे ही अपने मन में उनकी मूरत बना कर चाहने लगी हु।

कामिनी : ले ठीक है भाई पर ऐसा ना हो कि सपनो का महल टूट जाए मुझे तो तुम्हारा प्यार बहुत येड़ा मेड़ा लग रहा है जो भी हो , तेरी मर्जी जैसी तुम्हारा मन करे।


2. शिकार का दिखावा और राजकुमार दयावीर की असली रणनीति

फुर्तीला हिरण उनकी नजरों के सामने से तेजी से गुजर गया।
फुर्तीला हिरण 


इधर, राजकुमार दयावीर अपनी टोली के साथ जंगल के भीतर एक शांत और पथरीले मार्ग से आगे बढ़ रहे थे। तभी अचानक झाड़ियों की सरसराहट के बीच से एक बेहद सुंदर और फुर्तीला हिरण उनकी नजरों के सामने से तेजी से गुजर गया।

सैनिकों में से एक ने उत्साह में आकर तुरंत कहा:

सैनिक : राजकुमार, वो देखो हिरण! मारो उसे!

लेकिन राजकुमार दयावीर ने अपनी तलवार को संभालते हुए साफ मना कर दिया और शांत स्वर में बोले:

राजकुमार दयावीर : कोई भी किसी भी जानवर को नहीं मारेगा,ना ही प्रकृति को छेड़ेगा।

यह सुनकर पास खड़े एक सैनिक से रहा नहीं गया और उसने उलझन भरे स्वर में पूछा:

सैनिक : मुझे आपकी रणनीति समझ में नहीं आई, राजकुमार। हम निकले तो शिकार के लिए हैं, पर अचानक आपका मना करना मुझे समझ में नहीं आया और ना ही पल्ले पड़ा ये मेरी सूझ बुझ के बाहर है ऐसा क्यों ?

राजकुमार दयावीर ने अपने सैनिकों की तरफ देखते हुए गंभीरता से समझाया:

राजकुमार दयावीर : सुनो, हक़ीक़त ये है कि हम किसी भी प्राणी के साथ हिंसा नहीं करेंगे। ये जंगल भी हमारे राज्य का हिस्सा है और इन जीवों की रक्षा करना भी हमारा कर्तव्य है।

सैनिक : क्षमा करना राजकुमार, तो हम किस लिए आए हैं? कोई खास वजह?

राजकुमार दयावीर : हाँ, हम सिर्फ इस जंगल की सीमाओं में बेजुबान जीवों को कुछ घुसपैठियों से बचाने आए हैं। कुछ लोग इन सीमाओं में चुपके से घुसकर इन मूक जीवों को मार रहे हैं और अवैध रूप से बेच रहे हैं। हम सिर्फ इसी बात का मुआयना करने आए हैं। शिकार तो सिर्फ एक बहाना था; अगर असल वजह खुलेआम सामने आ जाती, तो वो शिकारी जो इस जंगल में छिपे हैं, चौकन्ने हो जाते और हमारे हाथ कभी नहीं लगते सिर्फ यही वजह है जो तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ रही है ज्यादा दिमाग मत चलाओ मै जैसा कह रहा हु वैसा करो किसी जीव को हानि मठ पहुंचाओ।


3. रथों की टक्कर और राजकुमार की बाहों में राजकुंवरि कुमारी

एक-दूसरे में इस तरह खो गईं
एक-दूसरे में इस तरह खो गईं


यह सारी बातें थोड़ी दूर एक दूसरे समानांतर रास्ते से अपने रथ को बेहद धीरे और बेआवाज़ गति से आगे बढ़ाती हुई राजकुंवरि कुमारी ध्यान से सुन रही थीं। राजकुमार की इस महान सोच और जीवों के प्रति प्रेम ने उनके दिल में सम्मान की आग को और भड़का दिया।

अब और अधिक इंतजार करना उनके वश में नहीं था। 

कुछ ही पलों में, राजकुंवरि कुमारी ने अपना रथ पूरी ताकत से दौड़ा दिया। 

उन्होंने जानबूझकर रास्ता बदला और रथ पर से अपना नियंत्रण खो देने का एक नाटकीय अंदाज अपनाया। उनका रथ सीधे राजकुमार दयावीर के रथ से जाकर जोरदार तरीके से टकराया!

टक्कर इतनी तेज थी कि कुमारी का संतुलन बिगड़ गया और वह हवा में लहराती हुई सीधे राजकुमार दयावीर की मजबूत बाहों में जा गिरीं।

उस एक पल के लिए जैसे समय वहीं ठहर गया था। राजकुमार दयावीर की आँखें और राजकुंवरि कुमारी की आँखें एक-दूसरे में इस तरह खो गईं, और उनके तन एक-दूसरे से ऐसे लिपट गए, मानो वे दोनों जन्म-जन्मांतर से इसी एक मिलन की आस में तड़प रहे हों। चारों तरफ एक अजीब सा नशा और सुकून छा गया था।

तभी कुछ ही दूरी पर नीचे गिरीं कामिनी और उनकी सखियाँ उठीं और हल्की-फुल्की चोटों को झाड़ते हुए दौड़कर वहाँ पहुँचीं। कामिनी ने आगे बढ़कर राजकुंवरि कुमारी और राजकुमार दयावीर को एक-दूसरे से अलग किया।

संभलते हुए, राजकुमार दयावीर ने अपनी निगाहें कुमारी पर टिकाईं और कड़े शब्दों में पूछा:

राजकुमार दयावीर : कौन हैं आप लोग? और एक महिला होकर इस घने जंगल में आप लोग यहाँ क्या कर रही हैं?

राजकुमारी कुमारी जानती थीं कि उनके पास अब ज्यादा वक्त नहीं है, क्योंकि आगे चलकर ऐसा मौका मिले या न मिले। उन्होंने बिना डरे कहा:

राजकुमारी कुमारी : हम आपके पड़ोसी राज्य वैय्यार से हैं, राजकुमार, और हम आपसे कुछ बात करना चाहते हैं, अकेले में।

राजकुमार दयावीर ने एक राजकुमारी के पद, उनके स्त्री होने के अधिकार और मर्यादा का पूरा सम्मान करते हुए उन्हें थोड़ा दूर एक एकांत स्थान पर चलने का इशारा किया। थोड़ा हटकर ले जाने के बाद दयावीर ने पूछा:

राजकुमार दयावीर : कहिए, क्या बात करना चाहती हैं आप?

कुमारी ने अपनी धड़कनों पर काबू पाते हुए कहा:

राजकुमारी कुमारी : सुनिए राजकुमार, चाहे आप मुझे न जानते हों, मगर मैं आपको अच्छी तरह जानती हूँ। और जब आपने हमारे राज्य पर युद्ध करने से अपने पिता को रोका था, और आपके उस नेक दिल के किस्से चारों तरफ फैले, उन्हें सुनते-सुनते ही मैं आपको बिना देखे ही आपसे एकतरफा प्यार करने लगी थी। मुझे माफ करिए गा मैने आपकि इजाजत और आपसे इजहार किए बिना ही आपकी छवि को मैने अपने मन में समा लिया और आपसे सच्चा प्यार करने लगी।


4. अचानक हमला और राजकुंवरि कुमारी का अद्भुत रणकौशल

राजकुंवरि कुमारी ने अपनी कमर से तलवार निकाली
राजकुंवरि कुमारी ने अपनी कमर से तलवार निकाली


अभी राजकुमार दयावीर के मुंह से कोई अगला शब्द निकल ही रहा था, तभी जंगल की घनी झाड़ियों और पेड़ों की ओट से उन छिपे हुए घुसपैठियों और शिकारियों के बाण सनसनाते हुए पूरी रफ्तार से आ निकले और सीधे उनके रथों से टकराने लगे।

चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई और सब चौकन्ने हो गए। दोनों तरफ से तीरों की बौछार और तलवारों की खड़खड़ाहट के साथ घमासान युद्ध शुरू हो गया।

दुश्मन के छक्के छुड़ाते हुए राजकुमार दयावीर अपनी तलवार की अचूक कला दिखा रहे थे, लेकिन तभी जो हुआ उसने सबको हैरान कर दिया। राजकुंवरि कुमारी ने अपनी कमर से तलवार निकाली और ऐसी अद्भुत चालाकी, फुर्ती और वीरता दिखाई, मानो अकेले सौ सैनिकों की ताकत उनके भीतर समाई हो। वह किसी पेशेवर और अनुभवी योद्धा की तरह दुश्मनों पर टूट पड़ीं।

इस दृश्य को देखकर राजकुमार दयावीर चौक कर रह गए। उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं और वे अवाक होकर बस कुमारी को ही देखने लगे। उनके मन में कुछ पल पहले जो एक अनचाहा तिरस्कार या संकोच था, वह इस अदम्य साहस को देखकर पूरी तरह विलीन हो गया और वह कुमारी के रणकौशल के कायल हो गए।

युद्ध के बीचों-बीच, राजकुमार दयावीर इस अद्भुत आकर्षण और प्रेम के समंदर में डूबते चले गए, जबकि राजकुंवरि कुमारी लगातार मुस्कुराते हुए और राजकुमार की आँखों में गहरी नजरें गड़ाए हुए अपने तीरों से दुश्मनों का सफाया करती जा रही थीं।

यह रोमांच यहीं समाप्त नहीं होता; इस कहानी के आगे के अनछुए और रहस्यमयी पड़ाव को हम भाग तीन में जानेंगे। तब तक बने रहिए हमारे ब्लॉग के साथ और इंतज़ार कीजिए कल का!


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