मुनिया 4 | hindi thriller and suspancefull story
डिस्क्लेमर: यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है इसका मकसद किसी भी व्यक्ति जाति धर्म समुदाय या कानून व्यवस्था की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं है यह कहानी सिर्फ एक सामाजिक चिंतन और मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है
1. कहानी का अगला मोड़ और मुनिया की बेबसी

मुनिया ने अपने जिस्म और रूह के हर एक दर्द को छुपाने की बहुत कोशिश की थी। वह दर्द जो उसके अंदर गहरा बन चुका था, उसे दबा कर वह पूरी ताकत से भागी थी। भागते भागते उसकी सांसें फूल रही थी, पैरों में छाले पड़ चुके थे, लेकिन उम्मीद की एक किरण थी जो उसे रुकने नहीं दे रही थी।
इसी भटकती हुई हालत में रात के ठीक तीन बजकर तीस मिनट पर वह पुलिस स्टेशन पहुंची। उसे लगा था कि कानून के इस घर में कदम रखते ही वह महफूज हो जाएगी, लेकिन वहां का नजारा देख कर वह हैरान रह गई। पूरे थाने में सन्नाटा पसरा हुआ था।
मुनिया ने बिना वक्त गंवाए थाने का दरवाजा खटखटाना शुरू किया। पहले आराम से फिर थोड़ा जोर से, पर अंदर से कोई जवाब नहीं आया। उसका डर अब गहरा होता जा रहा था। वह लगातार दरवाजे को बार बार ठोकती रही, अपने दोनों हाथों से उसे पीट रही थी और पूरी ताकत से कह रही थी कि कोई तो दरवाजा खोलो, कोई तो मेरी मदद करो। लेकिन उस सुनसान रात में उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था।
लगातार तीस मिनट तक वह चिल्लाती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया। उसने हांफते हुए इंस्पेक्टर को फोन कॉल लगाने की कोशिश भी की, पर फोन की घंटी बजती रही और किसी ने कॉल नहीं उठाया। हार कर उसने फिर से दरवाजे पर अपने हाथों से जोर जोर से मारा, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सिर्फ खामोशी ही जवाब में आई।
2. इंतजार की लंबी रात और सुबह का उजाला

देखते ही देखते सुबह के चार बज चुके थे। मुनिया अब पूरी तरह से थक चुकी थी। उसके जिस्म में अब खड़े रहने की भी हिम्मत नहीं बची थी। वहां खड़े रहने का कोई फायदा नहीं था।
मुनिया उस जगह से निकल कर थोड़ा आगे चली, तो उसे एक चाय की दुकान दिखी जो अभी खुल रही थी। उसने वहां जाकर एक गरम चाय पी ताकि उसके जिस्म की ठंडक और डर थोड़ा कम हो सके। चाय पीने के बाद मुनिया वहीं एक कोने में बैठ गई और सुबह के छह बजने का इंतजार करने लगी, क्योंकि उसे लग रहा था कि शायद सूरज निकलने के बाद कोई उसकी फरियाद सुनेगा।
चाय दुकानवाला: क्या हुआ बहन, इतनी सुबह सुबह?
मुनिया: थोड़ा परेशानी में हूँ भैया, सोचा थाने में शिकायत करूँगी तो कुछ हल मिलेगा।
चाय दुकान वाला: अरे बहन, ये हमारा थाना छोटा है, इस वजह से रात के समय सिर्फ एक कांस्टेबल को रख कर सब घर चले जाते हैं। वैसे भी रात के समय बहुत कम लोग आते हैं।
मुनिया मन ही मन में सोचने लगी: चलो एक आखिरी उम्मीद के साथ 6 बजे जाके देखूंगी।
3. कांस्टेबल का रवैया और समाज की सोच

जैसे ही सुबह के छह बजे, मुनिया एक नई उम्मीद के साथ फिर से पुलिस स्टेशन आ गई। इस बार किस्मत ने थोड़ा साथ दिया और उसने देखा कि एक कांस्टेबल उसी वक्त उठा था और बाहर आ रहा था।
मुनिया दौड़ कर उसके पास गई और बोली कि साहब मैं सुबह तीन बजे से इस दरवाजे को खटखटा रही हूं, मेरी बात सुनिए।
कांस्टेबल ने मुनिया को देखा और पूछा कि ऐसी क्या बात है जो इतनी सुबह तुम यहाँ आई हो?
मुनिया ने कहा कि साहब बहुत बड़ी समस्या है, मुझे आपको सब कुछ बताना है, मेरी मदद कीजिए। लेकिन वह कांस्टेबल उस समय ड्यूटी बदलने की तैयारी में था। वह थोड़ा जल्दी में था।
मुनिया ने जब उसके चेहरे के बदलते भाव देखे तो उसने पूछा कि क्या हुआ साहब, मेरी मदद करो साहब।
कांस्टेबल ने बिना किसी हमदर्दी के रूखे लहजे में कहा कि अभी इंस्पेक्टर साहब नहीं हैं, तुम अभी जाओ और सुबह दस बजे आना, तब इंस्पेक्टर साहब आएंगे और तभी अपनी परेशानी उन्हें बताना।
4. एक बार फिर मुनिया की हार

कांस्टेबल के इस जवाब ने मुनिया के बचे-कुचे हौसले को भी तोड़ दिया। जहां उसे लगा था कि सुबह होते ही उसे इंसाफ का रास्ता मिलेगा, वहां उसे सिस्टम की लेट-लतीफी देखने को मिली।
एक बेटी, एक इंसान जो रात से अपनी बहन के लिए मदद मांग रही थी, उसे समय के कारण टाल दिया गया। यहां पर भी मुनिया को निराशा हाथ लगी, उसकी लड़ाई अब और भी मुश्किल हो गई थी।
मुनिया को अब कुछ समझ नहीं आ रहा था। मुनिया ने सोचा चलो अब मैं अपने माता पिता के यहाँ चली जाती हूँ, यही सोचकर वह वहाँ से निकल गई।
वहाँ जाने के बाद क्या होता है, पार्ट 5 में पढ़ेंगे। आगे के 5वें भाग में उन दोनों का अगला कदम क्या होगा, जो मुनिया को जीने नहीं देना चाहते।
बने रहिए, 5वें भाग में विस्तार से बताऊंगा।
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