"किसान की मुर्गी" भाग 2 (Kisan Ki Murgi)

 5. गाँव की डरावनी अफ़वाहें और खंडहर   में चोरी का बसेरा

डरावनी अफ़वाहें फैलने लगी थीं
डरावनी अफ़वाहें



इधर पूरे माया गाँव में अजीब-अजीब और डरावनी अफ़वाहें फैलने लगी थीं। दूसरी तरफ़, उस खंडर में नया चोर अपनी चोरियों को अंजाम देने में लगा हुआ था। वह हर रोज़ रात के अंधेरे में किसी न किसी के घर हाथ साफ़ करता और सारा माल लाकर उसी वीरान खंडर में छुपा देता और वहीं अपना बसेरा डाले हुए था।


लेकिन असली खौफ़ तो तब शुरू होता है जब ठीक शाम के 7 बजते है।  और इमली के पेड़ के नीचे दफ़न वह जादुई मुर्गी अपनी आत्मकथा की तरह ठीक उसी वक़्त अपने किसान मालिक के लिए फफक-फफक कर रोने लगती है। उस मुर्गी के रोने की गूँज इतनी भयानक होती थी कि पहाड़ के उस पार ठीक उसी पल सूरज ढलता हुआ दिखाई देता था।


 मुर्गी के विलाप और उस अजीब रोशनी के असर से पहाड़ों के नीचे एक और सूरज का प्रतिबिंब (परछाई) पैदा हो जाता था। गाँव वालों के लिए इमली के पेड़ से आने वाली आवाज़ें पहले से ही सिरदर्द थीं, लेकिन अब आसमान में दो-दो सूरज का दिखना हर किसी के दिल को दहलाकर रख देने के लिए काफ़फ़ी था।


6. पूनम की खौफ़नाक रात और 5 फीट लंबी खूनी लाल आँखों वाली मुर्गी का साया


आख़िरकार वह रात आ ही गई
आख़िरकार वह रात आ ही गई


समय बीतता गया और आख़िरकार वह रात आ ही गई जो पूर्णिमा की थी। उस रात पूनम की चाँद की रोशनी ऐसी फैली रही थी कि अंधेरा भी जैसे डरकर छिपने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह  पूनम की चांदनी भी बहुत डरावनी लग रही थी।


उसी भयानक रात, वह नया चोर अपनी चोरी का माल समेटकर उस खंडहर में घुस रहा था। जैसे ही वह दबे पाँव उस शापित इमली के पेड़ के पास से गुजर रहा था, उसे फिर से किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी। चोर थोड़ा डरा, उसने इधर-उधर मुंडी घुमा कर देखा, पर अंधेरे में कुछ समझ न आने पर वह तेज़ी से खंडहर के अंदर घुस गया। 


अंदर जाकर उसने अपनी आज की चोरी का पूरा हिसाब लगाया और मन ही मन सोचा— "कल सुबह पूरा माल चोर बाज़ार में बेचकर मालामाल हो जाऊंगा।" यह सोचते-सोचते वह चैन की नींद सो गया।

लेकिन आधी रात यानी ठीक रात के 12 बजे, जब दुनिया गहरी नींद में थी, तब उस खंडहर में एक खौफ़नाक मंजर शुरू हुआ। वह मरी हुई मुर्गी अब कोई आम पक्षी नहीं, बल्कि 5 फीट लंबी एक डरावनी शक्ति बन चुकी थी। वह रोते हुए बुदबुदा रही थी— "मेरे मालिक से मुझे किसने अलग किया?"—यह कहते हुए वह सीधे उस खंडहर के अंदर दाखिल हो गई।

सोते हुए चोर के कानों में फुसफुसाहट गूँजी— "फूस्स... फूस्स... कुक्कुडकू...!" और वह हवा में मुंडी हिलाते हुए रोने लगी। जैसे ही चोर ने घबराकर अपनी आँखें खोलीं, उसकी चीख निकल गई। उसके ठीक सामने 5 फीट लंबी वही मुर्गी खड़ी थी और उसकी दोनों आँखें अंगारे की तरह एकदम लाल दिख रही  थीं।


7. इल्यूजन का मायाजाल और ऊंचे पेड़ पर बनी रहस्यमयी झोपड़ी


अपनी जान बचाने के लिए चोर पागलों की तरह भागता हुआ
इल्यूजन



अपनी जान बचाने के लिए चोर पागलों की तरह भागता हुआ खंडहर से बाहर भागा। लेकिन रात के 12 बजे उसे ऐसा अजीब इल्यूजन हुआ कि मानो अभी रात के 12 नहीं बल्कि शाम के 7 बज रहे हों और उसे आसमान में दो-दो सूरज साफ़ दिखाई दे रहे थे।

एक गांव में दो सूरज
दो सूरज


चोर ने अपनी आँखें मलीं, दुबारा आँख खोलकर अपनी कलाई की घड़ी देखी। घड़ी में तो रात के ठीक 12 बज रहे थे, मगर माहौल शाम के 7 बजे जैसा थमा हुआ और डरावना था। वह चीखता हुआ भागता गया और वह 5 फीट लंबी खूँखार मुर्गी ठीक उसके पीछे-पीछे रोते और चिल्लाते हुए उसका पीछा करती रही। दोनों भागते-भागते गाँव की सीमा से निकलकर बहुत दूर एक घने और वीरान जंगल के बीचों-बीच जा पहुँचे।

जंगल के उस गहरे सन्नाटे में उन्होंने देखा कि सामने एक बेहद विशाल, बिल्कुल सीधा और 70 फीट लंबा एक इकलौता पेड़ खड़ा है। उस लंबे पेड़ के सबसे ऊपर एक लकड़ी की झोपड़ी बनी हुई थी। 


बिना एक पल गंवाए, अपनी जान बचाने के लिए वह चोर उस पेड़ पर बनी सीढ़ियों के सहारे पूरी ताकत और मेहनत से चढ़ता हुआ सीधे उस झोपड़ी तक जा पहुँचा। उसने नीचे मुड़कर देखा, तो वह मुर्गी वहाँ कहीं नज़र नहीं आ रही थी, लेकिन ऊपर चढ़ते-चढ़ते सुबह की पहली किरणें निकल चुकी थीं।


          8. झोपड़ी का अंधा वासी और अनसुलझा सवाल

झोपड़ी के दरवाज़े के पास पहुँचा
झोपड़ी



जैसे ही चोर हाँफते हुए उस झोपड़ी के दरवाज़े के पास पहुँचा और अंदर झाँककर देखा, तो अंदर का नज़ारा देख सन्न रह गया। उस झोपड़ी के अंदर एक ऐसा आदमी रहता था जिसकी आँखों की रोशनी नहीं थी यानी वह पूरी तरह अंधा था।


लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उस अंधे आदमी के पास देखने के लिए आँखें भले न हों, लेकिन वह हवा के रुख, शब्दों की सरसराहट और हवाओं की खुशबू से हर चीज़ का अंदाज़ा आँख वाले इंसानों से भी कई गुना बेहतर तरीके से लगा सकता था।


जैसे ही चोर झोपड़ी के अंदर दाखिल हुआ, उस अंधे आदमी को तुरंत आहट से किसी के होने का अहसास हो गया। उसने अपनी गंभीर आवाज़ में सीधा सवाल किया— "कौन हो तुम?"

आगे क्या होता है?

वह रहस्यमयी अंधा आदमी कौन था जो दुनिया से कोसों दूर इतनी उँचाई पर अपनी जिंदगी गुजार रहा था? और उस इंसान का इस जादुई मुर्गी और इस खौफ़नाक कहानी से आख़िर क्या संबंध है?

यह सब जानेंगे 'किसान की मुर्गी' के भाग 3 में। तब तक बने रहिए इस कहानी के साथ, भाग 3 बहुत जल्द आएगा! यह क्लिक करे भाग 1 के लिए



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