पापा वापस नहीं आए | Hindi emotional story

पहेलीपुर गाँव, शहनाई और एक बगावत



पहेलीपुर गाँव। एक छोटा सा गाँव, जहाँ आज भी जात-पात को बहुत बड़ा माना जाता है। इसी गाँव का लड़का था प्रीतम प्यारे। दिल का बहुत साफ, पर जिद्दी। उसने गाँव की ही एक दूसरी जात की लड़की लिखिता से प्यार कर बैठा। लिखिता भी उससे बहुत प्यार करती थी।


दोनों ने घर से भाग कर इंटरकास्ट प्रेम विवाह  किया। इस एक फैसले ने पूरे गाँव को उनका दुश्मन बना दिया। प्रीतम के माँ-बाप ने दरवाजा बंद कर दिया, लिखिता के माँ-बाप ने भी रिश्ता तोड़ दिया। दोनों के पास  न छत था ना कोई अपने।


पर फिर भी, बिना घर-बार के, किराए के एक टूटे-फूटे घर में अपनी लिखित के साथ वो  खुश था। भगवान ने उन्हें दो प्यारे बच्चे भी दिए - एक 8 साल की समझदार लड़की और एक 5 साल का शरारती लड़का। भले ही घर-परिवार ना हो, फिर भी एक दूसरे के साथ उनकी जिंदगी बहुत अच्छी खासी चल रही थी। किसी चीज़ की कमी नहीं  थी।


प्रीतम प्यारे के पास जमीन नहीं थी। पढ़ा-लिखा भी ज्यादा नहीं था। उसके पास थी तो सिर्फ उसकी हुनर - शहनाई और ढोल बजाना। वो इतना अच्छा बजाता था कि लोग दूर-दूर से उसे बुलाने के लिए ढूंढते हुए आते थे  । गाँव में एक बात मशहूर थी - 


"चाहे शादी हो या कोई शुभ कार्यक्रम, कहते हैं प्रीतम प्यारे की शहनाई के बिना महफिल अधूरी सी अनकही कहानी है।"


और वो इसी शहनाई की वजह से ही लिखिता से मिला था। एक शादी में लिखिता ने उसकी शहनाई सुनी, आंखों से आंखे मिलीं, और दोनों के बिच में प्यार हो गया ।


एक दिन गर्मी के मौसम में, किराए के घर के आंगन में चारपाई पर प्रीतम, लिखिता और उनके सोते हुए दो बच्चे लेटे हुए थे। ऊपर खुला आसमान था। लिखिता आसमान में टिमटिमाते चमकते हुए तारों को देखते हुए बहुत भोलेपन से पूछती है,


लिखिता: सुनो जी, हम अपने बच्चों को बहुत पढ़ाएंगे ना? इतना पढ़ाएंगे कि अफसर बन जाएं। एक ना एक दिन तो मेरे पापा और माँ मेरे पास हम दोनों को प्यार से घर बुलाने आएंगे हम दोनों को  माफ  भी कर देंगे।


प्रीतम उसकी बात सुन कर मुस्कुराया और बोला,


प्रीतम: हाँ ना लिखिता, माँ-पापा नहीं हैं, मेरे परिवार से हमें कोई सपोर्ट नहीं है, तुम इस बात की चिंता मत करो। मैं हूँ ना तुम्हारा परिवार। और देखो, सोते हुए बच्चे कितने प्यारे लग रहे हैं। जब तक मैं हूँ, तुम्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूँगा।


लिखिता उसकी छाती पर सिर रख कर सो गई।


    वो छोटा सा घोंसला और वो बुरी लत



इतनी खुशहाल जिंदगी थी, सब कुछ परफेक्ट चल रहा  था, मगर प्रीतम प्यारे को एक ही बुरी आदत थी - गाड़ी तेज चलाने की आदत। उसे अपनी 200 सीसी बाइक पर बहुत घमंड था।


लिखिता को इस बात का हमेशा डर लगा रहता था ।  लिखिता हर रोज चौखट पर आकर हेलमेट देती और कहती,


लिखिता: सुनो जी, अपना ध्यान रखना। बाइक धीरे चलाना। जल्दी आने की कोई जरूरत नहीं है।


प्रीतम: हाँ हाँ, ठीक है, तुम चिंता मत करो।


पर थोड़ी दूर जाते ही प्रीतम हेलमेट को निकाल कर टंकी पर लटका देता और गाड़ी को 80-90 की स्पीड में भगाता। उसे लगता था सड़क खाली है, कुछ नहीं होगा। कई बार गिरते-गिरते भी बचा, घुटने छिले, फिर भी वो किसी की एक ना सुनता।


एक बार सिटी से थोड़े दूर हेलमेट चेकिंग हो रही थी और प्रीतम प्यारे अपनी मगन में तेज आ रहा था। जैसे ही प्रीतम को आगे पुलिस दिखी, उसने जोर से सडन ब्रेक मारा। पीछे का टायर थोड़ा स्किड हुआ, ज़ोर की आवाज़ आई।


ये पूरा कारनामा दरोगा साहब ने देखा और उसे बुलाया और समझाया,


दरोगा: इतनी भी क्या जल्दी है स्वर्ग लोक जाने की? थोड़ा रुक भी जाओ भैया। उड़ के जा रहे हो क्या?


प्रीतम: हाँ साहब सॉरी, दिखा नहीं।


दरोगा: लाइसेंस और गाड़ी के कागज निकालो।


प्रीतम ने जेब से निकालते हुए कहा: ये लीजिए साहब सब परफेक्ट है, लाइसेंस, पीयूसी, इंश्योरेंस सब।


दरोगा: सब परफेक्ट तो है पर हेलमेट ना पहनने का और ओवर स्पीड के लिए 250 फाइन मार दिया हूँ, जाओ ऑनलाइन भर लेना।


प्रीतम को गुस्सा आ गया: ये क्या है साहब, हर जगह परफेक्ट है और हेलमेट रखा भी हूँ फिर भी आपने चालान काट दिया, ये तो सरासर नाइंसाफी है।


दरोगा साहब ने थोड़ा नरम होकर कहा: देखो भाई, आपने सब रखा है पर पहना नहीं है और ऊपर से इतना तेज गाड़ी चला रहे थे। हमने चालान इसलिए काटा है ताकि तुम सही सलामत अपने घर जा सको, तुम्हारे बच्चे तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे।


प्रीतम घुस्सा होके घर चला गया, पर उसे ये समझ नहीं आया।


घर पहुँचते ही सीन बदल जाता था। जैसे ही प्रीतम की गाड़ी की आवाज़ आती, बच्चे गाड़ी के पास दौड़ कर आते और हग करके पप्पी देकर बोलते,


बच्चे: पापा आ गए! लव यू पापा!


और लिखिता भी फ्रिज से ठंडा पानी लाकर देती है और पूछती है,


लिखिता: बहुत थक गए होंगे, चाय बना देती हूँ, पीकर आप नहा लेना, आराम से डिनर करेंगे।


उस रात प्रीतम ने शाम को डिनर करते वक्त लिखिता से कहा,


प्रीतम: लिखिता सुनो।


लिखिता: हाँ बोलो।


प्रीतम ने एक छोटा सा गिफ्ट बाहर निकालते हुए कहा: एक प्यारा सा घोंसला है हमारा और तुम मेरे पंछियों की रानी हो, तुमसे बहुत प्यार करता हूँ लिखिता और जिंदगी भर करता भी रहूँगा , ख्वाहिश तो है तुम्हारे साथ एक पंछी बनकर आसमान में उड़ने की, पर जितना मिला है उतने में भी खुश हूँ, हैप्पी 13th एनिवर्सरी माय बेबी लिखिता।


लिखिता की आँखों में आँसू आ गए,


लिखिता: आव्व्व थैंक यू, आपको भी हैप्पी एनिवर्सरी मै हसबैंड जी।


और दोनों बच्चे उसके पापा से चिपक गए और बोले, आई लव यू मम्मी डैडी एंड हैप्पी वेडिंग एनिवर्सरी।


 वो आखिरी दिन



अगले दिन प्रीतम अपनी गाड़ी लेकर एक नए मकान के उद्घाटन पर शहनाई बजाने को निकल पड़ा। वहाँ उसने बहुत अच्छे से परफॉर्मेंस किया, लोगों ने बहुत तारीफ की। उसे उसकी कमाई के साथ-साथ टिप में भी आज ज्यादा पैसे मिले। वो खुशी-खुशी अपनी बाइक लेकर निकल पड़ा।


आज टिप में थोड़े ज्यादा पैसे मिलने की खुशी में उसने जिंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी गलती कर दी। घर से 7 किलोमीटर दूर वाले हरेली गाँव के पास सड़क किनारे बनी शराब की दुकान पर वो रुक गया। वहाँ उसने नशे का सेवन कर लिया। उसे लगा आज तो जश्न बनता है। और उसी नशे की हालत में वो तेज रफ्तार से गाड़ी भगाने लगा।


उस दिन लिखिता सुबह ही अपनी माँ से मिलने मायके चली गई थी उसे उम्मीद थी कि उसकी मां कभी न कभी तो बात करेगी। उसने जाते वक्त बच्चों से कहा था - मैं शाम तक आ जाऊँगी, तुम दोनों घर पर ही रहना, कहीं जाना मत। इसलिए दोनों बच्चे उस दिन घर पर अकेले थे, अपने पापा का इंतजार कर रहे थे कि पापा आएंगे तो साथ में खाना खाएंगे।


वो ब्रिज और वो मंजर



घर पहुँचने में थोड़ी ही दूरी बची थी, मुश्किल से 1 किलोमीटर। सामने वही पुराना ब्रिज था। अचानक से पुराने ब्रिज के बीचों-बीच से दूध की ऑटो धीरे-धीरे आ रही थी, मगर प्रीतम ने नशे में होश खोते हुए सीधा जाकर उस दूध की ऑटो पर दे मारी और वहीं गिर गया। हेलमेट नहीं पहना था, इसलिए सिर पर बहुत गंभीर चोट लगी और वहीं सब कुछ खत्म हो गया। उसकी शहनाई वहीं पास में गिरी हुई थी।


इधर-उधर वाले लोग आए, सब देखते ही  रह गए।


तभी वहीं खड़ा एक आदमी जो प्रीतम को जानता था, वो भागता हुआ प्रीतम के किराए वाले घर की तरफ गया। वहाँ आंगन में दोनों बच्चे अकेले बैठे थे। दरवाजा खटखटाते हुए उसने हांफते हुए कहा,


"बेटा, तुम्हारे पापा का ब्रिज पर बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया है..."


ये सुनते ही 8 साल की बच्ची के हाथ से गुड़िया गिर गई। उसे समझ आ गया कुछ बहुत बुरा हुआ है। उसने अपने 5 साल के छोटे भाई का हाथ कस कर पकड़ा। दोनों की आँखों में आँसू आ गए और वो दोनों नंगे पैर, रोते हुए, अकेले ही उस पुराने ब्रिज की तरफ दौड़ पड़े। पीछे कोई बड़ा नहीं था, क्योंकि उनकी मम्मी तो मायके अपनी मां से बात करूंगी कह के गई थी।


और मैं, इस कहानी का लेखक, उसी समय उसी रास्ते से आ रहा था। सच कहूँ तो मै भी उस दिन उस दुकान पे एक बियर पिया था, ये मेरी भी बहुत बड़ी गलती थी। हाँ, मै भी पिया था। मैं भले ही 30 की स्पीड से धीरे आ रहा था, पर शराब पीकर गाड़ी चलाना हर हाल में गलत है। मैंने प्रीतम प्यारे को उस दुकान से निकलते वक्त देखा था, वो लड़खड़ा रहा था। मैने सोचा कि ये तो आज कल कॉमन ही है मुझे अहसास नहीं था कि आगे रस्ते में ।


मैं थोड़ा देर से पहुँचा, पर जब पहुँचा तो देखा ब्रिज पर भीड़ लगी हुए है। मैंने अपनी गाड़ी साइड में लगाई और पास गया। प्रीतम को उस हाल में देख कर मेरे होश उड़ गए। मैंने चिल्ला कर कहा एम्बुलेंस बुलाओ, पर अब देर हो चुकी थी।


तभी मैंने वो मंजर देखा जो मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता। सामने से दो छोटे-छोटे बच्चे, अकेले, रोते हुए, एक दूसरे का हाथ पकड़े दौड़ते हुए आ रहे थे।


लड़का रोते हुए चिल्ला रहा था: पापा! पापा! को क्या हो गया !


लड़की अपनी आँखें मलते हुए: भैया ने बोला पापा गिर गए... पापा... 


उन्हें लगा था पापा हमेशा की तरह उठ जाएंगे और उन्हें गले लगा लेंगे। पर जब वो भीड़ के पास पहुँचे और अपने पापा को जमीन पर निश्चल पड़ा देखा, तो वो दोनों वहीं घुटनों के बल बैठ गए और फूट-फूट कर रोने लगे। 8 साल की बच्ची अपने छोटे भाई को सीने से लगा कर रो रही थी, और छोटा भाई तो कुछ समझ भी नहीं पा रहा था, बस पापा-पापा कह कर रोए जा रहा था।


मैं वहीं खड़ा रो पड़ा, क्योंकि उसी उम्र के बच्चे मेरे भी हैं।


कुछ ही देर में लिखिता को भी मायके में खबर मिल गई और वो भागती हुई आई। जैसे ही उसने ब्रिज पर भीड़ और अपने दोनों बच्चों को अकेले रोते हुए देखा, उसके मुंह से एक ऐसी चीख निकली जो आज भी मेरे कानों में गूंजती है। वो चीख एक पत्नी की नहीं, एक पूरी दुनिया उजड़ जाने की चीख थी।


अंतिम संदेश


तो दोस्तों, जिंदगी बहुत कीमती है। एक हेलमेट, एक धीमी रफ्तार, और नशे से दूरी, बस इतना ही तो करना है।


सोचो, अगर उस दिन प्रीतम ने हेलमेट पहना होता, अगर उसने शराब पीकर गाड़ी न चलाई होती, अगर उसने थोड़ा धीरे चलाया होता, तो आज वो अपने बच्चों के साथ होता। उसके बच्चे अनाथ नहीं होते, लिखिता विधवा नहीं होती।


मैं हाथ जोड़ कर कह रहा हूँ, ये कहानी सिर्फ प्रीतम की नहीं है। ये हर उस इंसान की है जो सोचता है "अरे कुछ नहीं होगा, थोड़ी सी ही तो पी है, सड़क खाली है।"


भाई, कुछ हो जाता है। और जब होता है, तो सिर्फ एक आदमी नहीं मरता, पूरा परिवार मर जाता है।


इसलिए आज से कसम खाओ -

1. हेलमेट टंकी पर नहीं, सिर पर पहनो। 2. शराब पीकर कभी भी, किसी भी हाल में गाड़ी मत चलाओ। 3. 200 सीसी की गाड़ी है तो रेस मत लगाओ, ये पब्लिक की सड़क है। 

याद रखो, घर पर कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है।


गाड़ी धीरे चलाओ।


द एंड।

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