बरगद के पेड़ के नीचे के भूतों का खात्मा |Hindi bargad ke ped par bhooto ki daravani kahani

1.उड़न खटोले का सफर और जंगल का  भयंकर संकट



दयावीर के मामा दयावीर को लेकर बिना किसी  कदमों के आवाज  के एक जादुई उड़न खटोले में सवार होकर  घने जंगलों के बीचों-बीच निकल पड़े। 

यह सफर बेहद खतरनाक था क्योंकि हर पल अनहोनी का खतरा मंडरा रहा था। ठीक सूर्य भवन से साठ मील की दूरी पर आकर उड़न खटोले की जादुई सीमाएं समाप्त हो गईं।

 उस जादुई उड़ान खटोला को आगे ले जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उसने दोनों को उसी अत्यंत सघन और डरावने जंगल के बीचों बीच उतार दिया। 

जमीन पर उतरने के बाद दोनों ने पूरी सावधानी के साथ दबे पाँवों, एक-एक कदम बहुत संभलकर रखना शुरू किया ताकि किसी भी प्रकार की आवाज न हो।

उस घने जंगल से गुजरते वक्त काले साये, भूत, पिशाच, पिशाचिनी और अनगिनत डरावनी परछाइयाँ उन्हें तरह-तरह से भटकाने और डराने की कोशिश कर रही थीं। वे लगातार चिल्ला रही थीं कि वे आगे न बढ़ें और सूर्य भवन तक पहुँचने का उनका प्रयास बेकार है। लेकिन दयावीर के मामा ने अपने धैर्य, अदम्य साहस और अपनी तलवार की नोंक के सहारे अंधेरे के उस साम्राज्य में आधे से ज्यादा रास्ता सफलतापूर्वक तय कर लिया था। 

तभी अचानक अंधेरे में एक अनहोनी घटी और वे दोनों संतुलन खोकर एक गहरी खाई में जा गिरे। उस खाई में पानी होने के कारण जमीन पर कदमों की कोई आवाज नहीं हुई, जिससे वे अदृश्य ताकतों की नजरों से बच गए, लेकिन अब वहाँ से सुरक्षित बाहर निकलना एक नई चुनौती बन चुकी थी।

2.बरगद के पेड़ की रहस्यमयी और मूक मदद


खाई में गिरने के बाद दयावीर और उनके मामा दोनों मिलकर पूरी सावधानी के साथ बिना कोई आवाज किए बाहर निकलने की पूरी कोशिश कर रहे थे, लेकिन काफी देर तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी।

 लगातार दो घंटे की कड़ी शिद्दत और संघर्ष के बाद उन्हें एक ऐसी अनजानी मदद मिली जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। 

वह मदद कोई और नहीं, बल्कि वही पुराना बरगद का पेड़ था—वही बरगद जिसके तने से  कामिनी के मंत्रों दंड से भयानक अधवंशिका प्रकट हुई थी। 

असल में, उस विशाल पेड़ के भीतर बहुत ताकतवर सकारात्मक शक्तियाँ निवास करती थीं, जिन्हें अधवंशिका ने छलपूर्वक अपने नियंत्रण में कर लिया था और उस पर अपना कब्जा जमा लिया था।


तन से वह पेड़ अधवंशिका के चंगुल पूरी तरह फंसा हुआ था , फिर भी वह मौन रहकर सब कुछ सुन और देखकर सह रही थी इस संकट की घड़ी में उस पवित्र पेड़ ने अधवंशिका के बंधनों को तोड़ते  हुए अपनी सच्ची और सकारात्मक रिहाई को चुना तथा हमेशा की तरह अच्छाई का पक्ष लेने का फल उसे मिल सके। 

अचानक, दयावीर के मामा को उस बरगद के पेड़ की मजबूत जड़ें अपनी ओर खींचती हुई महसूस हुईं। 

बिना एक पल भी गंवाए और बिना किसी फालतू की सोच-विचार के, मामा ने अपनी पूरी ताकत लगाकर दयावीर धीरे धीरे बिना आवाज के ऊपर  खींच लिया। 

इस प्रकार, उस जादुई पेड़ की मूक सहायता से वे दोनों उस गहरी खाई से सुरक्षित बाहर आ गए और एक बार फिर अपने सही रास्ते पर आगे चल पड़े।

3.सूर्य भवन का द्वार और दिव्य लाठी की प्राप्ति



चलते-चलते आखिरकार वे दोनों अपनी मंजिल यानी सूर्य भवन के मुख्य द्वार तक पहुँच ही गए। जैसे ही वे सिंह द्वार के पास पहुँचे, चमत्कारिक रूप से वहाँ का विशाल दरवाजा अपने आप बिना किसी आवाज के खुल गया।

 द्वार के अंदर कदम रखते ही सामने माँ काली का एक दिव्य और भव्य मंदिर दिखाई दिया। उस मंदिर के प्रांगण और गर्भगृह के भीतर एक प्राचीन लाठी रखी हुई थी, जिस पर पहले से ही स्वर्ण अक्षरों में 'दयावीर' का नाम खुदा हुआ मिला जिसे देख कर वो लोग चौक गए मगर अभी ये सब बारीकी से जानने का समय नहीं था।

उस पवित्र लाठी और मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह मंदिर और उसमें जो दिव्य शक्तियाँ है केवल उसी व्यक्ति की सहायता करती थीं जिसका इरादा पूरी तरह से नेक और सत्य पर आधारित होता है।

 दयावीर और उनके मामा ने पूरी श्रद्धा के साथ माँ काली को प्रणाम किया और मन ही मन हांथ जोड़कर उनका धन्यवाद  किया। 

इसके बाद, वे उस पवित्र लाठी को अपने साथ लेकर दबे पाँवों वापस उसी बरगद के पेड़ की ओर चल पड़े जहाँ उन्हें अंतिम कार्य के लिए पहुँचना था। 

इस बार उनके रास्ते में कोई भी नकारात्मक ताकत या बाधा उत्पन्न नहीं हुई, क्योंकि उनके पास माँ काली की वह दिव्य लाठी थी।

उस लाठी के तेज और पवित्र प्रभाव से जंगल की सारी काली और दुष्ट ताकतें भयंकर रूप से डरती थीं, इसलिए कोई भी उनके करीब आने का साहस नहीं जुटा पाया।

4.अधवंशिका का अंत, कामिनी का पतन और राज्य में सुख-शांति



जैसे ही वे लोग वापस उस बरगद के पेड़ के पास पहुँचे और तने को देखा, दयावीर के मामा ने बिना कोई आवाज किए उस पवित्र लाठी को सीधे बरगद के तनी के बीचों बीच में रख दिया।

लाठी रखते ही एक चमत्कारी घटना घटी; वह लाठी बिना किसी शोर के चुपचाप उस पेड़ के अंदर समा गई। 

उसके समाते ही जंगल में कई तेज और डरावनी आवाजें गूँज उठीं, काले साये चीखते हुए इधर-उधर भागने लगे, और कुछ दुष्ट शक्तियाँ जलकर रोते हुए राख हो गईं।

उसी पल, राजकुमार दयावीर की चेतना पूरी तरह सामान्य स्थिति में लौट आई। वे गहरी नींद या भ्रम से बाहर आकर हड़बड़ा कर उठे और अचरज से बोले, "हम यहाँ जंगल में क्या कर रहे हैं, मामा श्री?"

उसी क्षण, वह बरगद का पेड़ जो लंबे समय से अधवंशिका की कैद में था, पूरी तरह से एक उज्ज्वल सकारात्मक शक्ति में बदल गया। 

उस दिव्य शक्ति ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अधवंशिका को अपनी गिरफ्त में खींच लिया और जिन-जिन निर्दोषों के रूहों को अधवंशिका ने अपनी कैद में रखा था, उन सभी को एक-एक करके पूरी तरह आजाद कर दिया। 

अधवंशिका चीखती रह गई और अंततः उसका नामो-निशान हमेशा के लिए मिट गया। 

दूसरी ओर, अपने ही रचे गए षड्यंत्र और बुरे मोह के कारण कामिनी अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी थी। 

उसके शरीर की नसें जवाब दे चुकी थीं और वह खटिया पकड़कर बिस्तर पर बेबस होकर मरीज बन गई।

उधर, राजकुमार दयावीर की जिंदगी पूरी तरह पटरी पर आ गई और उन्होंने अपने राज्य का कुशलक्षेम संभाल लिया। 

हालांकि, इन सबके बावजूद कामिनी की बहन कुमारी के मन में आज भी अपनी बहन के प्रति असीम दया और करुणा का भाव है, जो दयावीर को थोड़ा भी पसंद नहीं था। 

दयावीर ने राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली, और हमेशा की तरह  उसकी अर्धांगिनी कुमारी के साथ अपनी जिंदगी बिताने लगा।

उसकी बहन ने बहुत गलत किया था, फिर भी कुमारी चुप रही।

राजकुमार ने भी इस विषय पर अपनी पत्नी को कुछ नहीं कहा क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी अपनी अर्धांगिनी के मन में उसकी अपनी सगी बहन के प्रति किसी प्रकार की नफरत या बैर की भावना पैदा हो। जो हुआ सो हुआ, उसे पीछे छोड़कर अब पूरे राज्य में चारों तरफ सुख, शांति और खुशहाली का माहौल था। इसी बात पर विशेष ध्यान देते हुए राजकुमार दयावीर बहुत ही न्यायप्रिय तरीके से अपने राज्य की सत्ता संभाल रहे हैं।

Thank you

The end 

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