अ मैजिकल पेंटर, A Magical Painter Part 1 | Hindi Suspense Story

 अ मैजिकल पेंटर (A Magical Painter)

यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसके सभी पात्र और घटनाएँ केवल मनोरंजन के उद्देश्य से रची गई हैं।

यह कहानी 21 साल के एक सीधे-सादे, अविवाहित युवा की है। कहते हैं ना—पेट पालने और ज़िंदगी गुज़ारने के लिए कोई भी ईमानदारी का काम छोटा या बड़ा नहीं होता...

मेधा: दुनिया से छिपा एक रहस्यमयी शहर

दुनिया की नज़रों से दूर
दुनिया की नज़रों से दूर


दुनिया की नज़रों से दूर, जहाँ ढलता हुआ सूरज क्षितिज की अंतिम रेखा को छूता है, वहाँ 'मेधा' नाम का एक अनोखा शहर बसा हुआ था। यह शहर किसी देश का हिस्सा नहीं था। इसका अपना एक अलग वजूद था—अपनी मुद्रा (Currency), अपनी अलग व्यवस्था और अपनी एक खास पहचान।

पूरी दुनिया की नज़रों में मेधा एक बेहद गरीब और पिछड़ा हुआ इलाका माना जाता था। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी... इस शहर के पास जितना बेहिसाब पैसा था, उतना शायद पूरी दुनिया में किसी के पास नहीं था! दुनिया के 10 बड़े कॉरपोरेट दिग्गजों का अनगिनत काला धन यहाँ इस तरह छुपाकर रखा गया था कि किसी दूसरे देश को कानों-कान खबर तक न हो।

              मेधा शहर का एक मामूली मजदूर

सीधा-सादा लड़का
सीधा-सादा लड़का


इसी शहर में 21 साल का एक सीधा-सादा लड़का रहता था—हृदया।

गांव का यह कुदरा लड़का पेट पालने के लिए सीमेंट की भारी बोरियां ढोने का काम करता था। शरीर से थोड़ा भारी होने की वजह से वह यह थका देने वाला काम सही से नहीं कर पाता था। ज़िंदगी के झंझावातों में किसी तरह खुद को संभालते हुए, वह बस जैसे-तैसे अपनी सांसें खींच रहा था।

एक दिन उसके दोस्त अमित ने उससे कहा:

  1. "अरे मच्छा! मुझे एक कॉलेज में हाउसकीपिंग (सफाई) की नौकरी के बारे में पता चला है। महीने के ₹2000 मिलेंगे। सबसे अच्छी बात यह है कि वहाँ रहना और खाना एकदम फ्री है। कोई अलग से खर्च नहीं होगा, चले क्या?"

हृदया ने सोचा:

"वाह! रहने और खाने का कोई खर्चा नहीं और काम भी ज्यादा भारी नहीं होगा।" वह तुरंत मान गया।

अगले दिन कॉलेज मैनेजमेंट से मुलाकात हुई और हृदया ₹2000 महीने की तनख्वाह पर नौकरी पर लग गया।

वहाँ सब कुछ बहुत बढ़िया चल रहा था—अच्छा खाना, सुकून की नींद और एक सेट रूटीन। सुबह 8 बजे काम पर जाना, शाम 4 बजे रूम पर लौटना, नहा-धोकर आराम से खाना और सो जाना। देखते ही देखते 1 साल कब बीत गया, पता ही नहीं चला।

अपने सादे और नेकदिल स्वभाव की वजह से हृदया ने अपने सीनियर्स और अफसरों के दिलों में अच्छी जगह बना ली थी। उसका रोज़ का काम तय था—सुबह जाकर अपनी जिम्मेदारी वाली 'सीएससी (CSC) लैब' को चमकाना, बॉयज़ और लेडीज़ टॉयलेट की सफाई करना और बाकी समय में सर लोगों के बताए छोटे-मोटे काम निपटाकर शांति से बैठ जाना।

                हृदया पर लगा झूठा इल्जाम


बिल्कुल सफाई नहीं है!
बिल्कुल सफाई नहीं है!



सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन उस कॉलेज में एक नई मैडम की पोस्टिंग हुई। वह मैडम हृदया के भले और ईमानदार स्वभाव से बिल्कुल अनजान थी।

जैसे ही मैडम ने सीएससी लैब में कदम रखा, बिना आगे-पीछे सोचे उसने सीधे ऑफिस मैनेजर से लेकर कॉलेज के चेयरमैन तक शिकायत ठोक दी:

"इस कॉलेज में बिल्कुल सफाई नहीं है! कौन देखता है यह सब? इस लड़के को अभी के अभी नौकरी से निकालो और किसी दूसरे को रखो!" इतना कहकर वह गुस्से में अपनी कार में बैठी और फुर्र से निकल गई।

  1. अगले दिन, मैनेजर और सुपरवाइजर—जो जानते थे कि हृदया बहुत सीधा और मेहनती लड़का है—उसे नौकरी से निकालने की बजाय ऑफिस में बुलाया।
  2. मैनेजर ने कहा: "देख हृदया, तेरे काम की शिकायत आई है। नई मैडम बहुत गुस्से में हैं। ज़रा संभलकर काम किया कर।"
  3. हृदया थोड़ा घबरा गया और बोला: "जी सर, मैं आगे से और ध्यान रखूँगा।"

        अपमान का घूँट पी गया हृदया

लड़के, क्या कर रहा है यहाँ?
लड़के, क्या कर रहा है यहाँ?


अगली सुबह, हृदया लैब में पहुँचा। उसने जेंट्स टॉयलेट साफ किया और लेडीज़ टॉयलेट की सफाई में जुट गया।

उसी वक्त मैडम वहाँ आ धमकी और कड़क आवाज़ में बोली: "अरे लड़के, क्या कर रहा है यहाँ?"

हृदया ने नम्रता से कहा: "मैडम, आप दो मिनट बाहर रुकेंगी? मैं बस यह टॉयलेट साफ कर रहा हूँ।"

मैडम ने चिढ़कर कहा: "हाँ-हाँ, ठीक है!"

लेकिन इतना कहते ही उसने जानबूझकर अपने पास मौजूद एक सैनिटरी पैड वहीं फर्श पर फेंक दिया और ताना मारते हुए बोली: "अरे लड़के! यह क्या है? ढंग से साफ कर इसे!"

हृदया के दिल पर चोट लगी, लेकिन उसने चुपचाप कहा: "जी मैडम, मैं कर देता हूँ।" और उसने मैडम की आँखों के सामने ही पूरा टॉयलेट चमका दिया।

इतनी ईमानदारी से काम करने के बावजूद, उस मैडम का दिल नहीं पिघला। वह सीधे फिर से ऑफिस गई और दोबारा शिकायत कर दी: "यह लड़का काम ठीक से नहीं कर रहा है।"

             मैनेजर का फैसला और सस्पेंशन

Go to Home
Go to Home


मैनेजर ने हृदया को दोबारा ऑफिस बुलवाया।

मैनेजर: "क्या बात है हृदया? मुझे तो लगता था कि तू अच्छा काम करता है, लेकिन मैडम ने फिर से तेरी शिकायत की है। आखिर सीएससी लैब में ही बार-बार यह ड्रामा क्यों हो रहा है? तुझे अपनी तरफ से कुछ कहना है?"

हृदया (बेबसी से): "सर, मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है। जब मैडम जानबूझकर बार-बार ऐसा करेंगी, तो मैं भला क्या कर सकता हूँ?"

  1. हृदया का यह जवाब मैनेजर को पसंद नहीं आया।
  2. मैनेजर: "मुझे तेरी यह दलील पसंद नहीं आई। इसलिए मैं तुझे सस्पेंड कर रहा हूँ... Go to Home (घर जा)!"
  3. हृदया: "सर! प्लीज ऐसा मत कीजिए सर..."

मैनेजर: "मैं तुझे दूसरी बार देख रहा हूँ। पहली बार मैंने कुछ नहीं कहा, लेकिन अब सीधे ऊपर से ऑर्डर आया है तुझे काम से हटाने का।"

बेबस हृदया के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा था। भारी मन से उसने अपना सामान उठाया, कपड़े बाँधे और उस कॉलेज से बाहर निकल गया...

(आगे क्या हुआ? बेघर और बेरोजगार होने के बाद हृदया की ज़िंदगी में 'मैजिकल पेंटर' का मोड़ कैसे आया? जानने के लिए पढ़ें अगला भाग...)

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