अ मैजिकल पेंटर 2 | Hindi Full Suspense Story | Feel The Stories
अ मैजिकल पेंटर 2
नोट: इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएँ पूर्णतः काल्पनिक हैं। इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। यह कहानी केवल मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है।
नया सफर
कॉलेज की चौखट लांघकर जब वह एक नई जिंदगी की तलाश में निकला, तो हाथ सिर्फ थकान और मायूसी ही लगी।
जैसे-जैसे दिन गुज़र रहे थे, पेट पालने के लिए जो भी छोटा-मोटा काम मिलता, हृदय कर लेता। कभी कोई दो रुपये देकर पानी का मटका या बाल्टी उठवा लेता, तो उसी से ब्रेड का टुकड़ा खरीदकर पेट भर लेता और सो जाता।
रोज़ की वही दिनचर्या थी—कभी सीमेंट की बोरियाँ ढोना, तो कभी सड़क किनारे दिहाड़ी मजदूरी का काम ढूँढना। दिन भर में जो भी काम मिल जाए, उसी को अपनी किस्मत मानकर सबर कर लेना ही हृदय की नीयत बन चुकी थी।
इसी तरह करीब 6 महीने बीत गए।
एक दिन सड़क किनारे अचानक हृदय को उसका पुराना दोस्त अमित दिखाई दिया। हृदय उसके पास गया और हाल-चाल पूछा, तो पता चला कि अमित को भी उसी की तरह नौकरी से निकाल दिया गया है।
हृदय: "अरे छोड़ यार अमित! कौन सा कोई बहुत बड़ी कंपनी की पक्की नौकरी थी जो इतना उदास हो रहा है। चल, कोई बात नहीं! अब हम दोनों साथ मिलकर गुज़ारा करेंगे। मैं भी अकेला ही हूँ, कुछ न कुछ करके वक्त काट लेंगे।"
अमित: "सही बात है भाई! अब जो होना था सो हो गया। जिसने पैदा किया है, वो दाना-पानी भी दे ही देगा।"
हृदय: "बिल्कुल सच कहा! हम मेहनत करते रहेंगे, तो कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकल आएगा।"
अमित: "सही है मच्छा! जब तक यह सड़क है और हम साथ हैं, तब तक देख लेंगे!"
हृदय: "हाँ भाई, बिल्कुल!"
आसमान ही सीमा: सपनों की लहरें
दोनों दोस्तों की जिंदगी अब साथ चलने लगी। दिन में कोई न कोई मजदूरी मिल जाती, तो किसी तरह पेट भर जाता। कभी काम न भी मिलता, तो कोई न कोई भला इंसान खाने को कुछ दे देता। भगवान का आसरा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। जो भी छोटा-मोटा काम मिलता, दोनों मिलकर करते, भगवान का नाम लेकर पेट भरते और बेफिक्र होकर सो जाते।
जब कॉलेज में 2000 रुपये की नौकरी थी, तब खाना और कमरा मुफ्त था, तो बाहर का कोई खर्च नहीं था। पर अब फुटपाथ की जिंदगी में कमाई अनिश्चित थी। जिस दिन काम मिलता, दोनों का मिलाकर मुश्किल से 400 रुपये बन पाते थे।
जिस दिन काम न मिलता, तो फुटपाथ ही उनका ठिकाना बन जाता। खुला आसमान ही उनका साथी था।
रात के सन्नाटे में हृदय के दिल में उदासी तो होती थी, पर वह कभी अपनी किस्मत या दूसरों को कोसता नहीं था। वह अक्सर
- अमित से कहता:
- "अमीर तो अमीर ही रहता है मच्छा, हम गरीबों के पास क्या है? अमीर की मार से हम भले ही मिट्टी में मिल गए हों, पर उदास क्यों होना? ऊपर वाला हमारे साथ है! यह नीला आसमान ही तो हमारी रजाई है!"
- हृदय की यह बातें सुनकर वह तो चैन की नींद सो जाता, लेकिन अमित रात भर यही सोचता रहता कि हृदय से अपने दिल की बात कहे या न कहे।
यमदूतों का आगमन
वक्त बीतता गया, महँगाई आसमान छूने लगी, लेकिन उनकी किस्मत और 400 रुपये की दिहाड़ी वहीं की वहीं अटकी रही। तीन वक्त के खाने में ही 300 रुपये उड़ जाते थे, बचे 100 रुपये में कमरे का किराया कहाँ से देते?
अमित (एक रात खुले आसमान के नीचे लेटे हुए): "मच्छा, ऐसे कब तक बिना घर-बार के सड़क पर सोकर जिंदगी काटेंगे यार?"
हृदय: "देखते हैं भाई, जैसे ही मजदूरी के दाम बढ़ेंगे, हम भी अपने बजट में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लेंगे। सब ठीक हो जाएगा!"
इतना कहकर हृदय घूरर-घूरर खर्राटे भरते हुए गहरी नींद में सो गया।वे दोनों बेखबर सो रहे थे, पर उसी वक्त उनके पास यमराज खुद न आकर उनके दो दूत पहुँचे। असल में यमराज ने उस दिन अपने नए दूतों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें आत्माएँ लाने भेजा था।
पर उन नासमझ दूतों ने क्या किया? उन्होंने न तो चेहरे मिलाए, न ठिकाना देखा! सिर्फ नाम और जन्म-तिथि (Date of Birth) सरसरी तौर पर देखी और सोचा—"सही मौका है, दोनों गहरी नींद में हैं, कोई बहस भी नहीं होगी!"
दूतों ने सोते में ही दोनों की आत्माओं को कैद कर लिया और अपने यम-वाहन (भैंसे) पर बिठाकर यमलोक के रास्ते पर प्रस्थान कर दिया।
हृदय का सपना या सच?
गाड़ी कुछ दूर ही आगे बढ़ी थी कि पहले यमदूत को शक हुआ। उसने दूसरे से कहा: "अरे उस्ताद, जरा गाड़ी रोकना! एक बार इनके चेहरे उस सरकारी कागज़ से मिलाकर देख लें, कहीं कोई चूक तो नहीं हो गई?"
गाड़ी रुकी। जैसे ही उन्होंने दोनों के चेहरे मिलाए, पहले दूत के होश उड़ गए!
- "अरे बाप रे! यह क्या गड़बड़ हो गई! जरा ध्यान से देखना!"
- दूसरा दूत हड़ाबड़ाकर आगे आया: "क्या हुआ रे झिंगडू ? इतना क्यों घबरा रहे हो?"
जब उसने भी दोनों के चेहरे और कागज़ की फोटो देखी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक सी गई! यमराज के फरमान में नाम और जन्म-तिथि भले ही एक थे, लेकिन फोटो और रहने का पता पूरी तरह अलग था! वे गलत लोगों को उठा लाए थे!
दोनों दूत वाहन से नीचे उतरे और एक-दूसरे पर चिल्लाने लगे:
"तेरी वजह से यह सब हुआ सब तूने किया है! तूने बिना सोयहां क्लिक करेचे-समझे आत्माएँ उठा लीं!" अब इन निठल्लों का क्या
"अरे मेरी वजह से क्यों? कागज़ तो तू देख रहा था ना!"
दोनों के बीच भयंकर बहस छिड़ गई। उधर यमलोक पहुँचने का समय हाथ से निकलता जा रहा था, और इधर यमदूत आपस में ही सिर-फुटौवल कर रहे थे। हृदय और अमित अभी भी आत्मा के रूप में बेखबर नींद में थे, और दूत ज़ोर-ज़ोर से एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे थे...
"।
बाकी कहानी भाग 3 में पढ़ें... (भाग 2 समाप्त)
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कल इसका भाग 2 हिंदी में पब्लिश किया जाएगा, उसके बाद भाग 3 में देखेंगे कि असल में आगे क्या हुआ!
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