पुरानी संदूक (Part 1)

 Disclaimer  :  यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना है। कहानी में दिखाए गए सभी पात्र, स्थान और घटनाएं लेखक की कल्पना हैं। इस कहानी में शराब (दारू) के सेवन का ज़िक्र केवल किरदारों के मनोरंजन और मज़ाकिया मिजाज को दर्शाने के लिए किया गया है। हम किसी भी प्रकार से नशीले पदार्थों के सेवन का समर्थन या बढ़ावा नहीं देते हैं। कृपया स्वस्थ जीवन शैली अपनाएं।



1. मक्खनपुर के दो मस्त मिजाज दोस्त

दो मस्त मिजाज दोस्त

 



दो दोस्त है एक गांव में दो दोस्त है गांव का नाम है माखनपुर। ये दोनों दोस्त इतने मस्त मिजाज के है कि पूरे गांव में इनके जैसा कोई दूसरा नहीं। इनकी जिंदगी का बस एक ही मकसद है—अपनी धुन में रहना और खुश रहना। ना इनको कमाने की चिंता है, ना खाने की, ना पीने की और ना ही दुनियादारी से कोई लेना-देना। दुनिया का नाम जाए भाड़ में, इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। इन दोनों की दोस्ती ऐसी है कि अगर इस दोस्त को वो jhinga बोलता था, तो वो इसको bhinga बोल देता था। बस, यही इनका नाम था और यही इनकी पहचान थी।

इनका रोज का एक ही रोजाना  था। दिन भर जंगलों में घूमना, प्रकृति के मजे लेना और कभी मन किया तो मयखाने में बैठकर तसल्ली से दारू पीना। दुनिया में क्या चल रहा है,क्या नहीं चल रहा है किसका घर बसा या किसका उजड़ा, इससे इन्हें रत्ती भर भी मतलब नहीं था।

सबसे मजेदार नजारा तो रात को देखने को मिलता था। जब रात के ठीक 9 बजते थे, तो ये दोनों मैखाने से बाहर निकलते थे। रास्ते पर चलते हुए दोनों एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाल लेते थे और लड़खड़ाते कदमों से झूमते हुए एक अजीब और मजेदार गाना गाते थे। वो गाना कुछ ऐसा था:


"रिंगा रिंगा रिंगा रिंगा... उसको भी मैं चाहूँ रिंगा रिंगा... दारू बिंगा पीठा जिंगा... जिंगारे हू हा मंगा मंगा..."है दूंगा दूंगा र भूँगा ओ ओ ओ ओ........ हो हो हो हो झींगा रे रिंगा रिंगा रिंगा 


ये दोनों जब यह गाना गाते थे, तो इनको खुद होश नहीं रहता था कि ये क्या ही गा रहे है और क्या ही कर रहे है। बस अपने धून में मस्त है दोनों, जैसे कुछ है ही नहीं अपनी लाइफ में। एक दम झिंगा जिंगा लाइफ थी इनकी। दिन भर पीना और यही झिंगा जिंगा गाते हुए आराम से घर आना। रास्ते में कोई मिले या ना मिले, ये किसी को कुछ नहीं बोलते थे और ना ही किसी फालतू इंसान का सुनते थे। बस, अपने घर आते, जो मिला वो खाके रात को सो जाते और सुबह उठते ही फिर से अपनी उसी दुनिया में चले जाते। इनका रोज का बस यही था।


2. मैखाने का दंगल और अनोखा एक्शन

अनोखा एक्शन


एक दिन की बात है, झिंगा और भिंगा हमेशा की तरह मक्खनपुर के उसी पुराने मैखाने में बैठे हुए थे। टेबल पर दारू की बोतल खुली थी और दोनों अपने ही ख्यालों में खोए हुए थे। तभी वहां गांव के दो लफंगे लड़के आए। वे दोनों खुद को बहुत बड़ा गुंडा समझते थे और पूरे मैखाने में अपनी धौंस जमाना चाहते थे।

वे दोनों झिंगा और भिंगा के टेबल के पास आकर रुक गए और अपनी छाती फुलाकर कड़क आवाज में बोले, "ये जिंगा भिंगा... तुम लोग यहां नहीं बैठोगे। चलो, बाहर जाके पियो, ये हमारा जगह है।"

झिंगा और भिंगा ने अपने हाथ में पकड़े दारू के गिलास को देखा, फिर उन लड़कों की तरफ देखा। उनके चेहरे पर डर का एक भी निशान नहीं था। उल्टा भिंगा ने बड़े आराम से मुस्कुराते हुए कहा, "क्यों भाई? यहाँ क्या खराबी है? आपके परदादा इसे आपको वसीयत में लिखके दिए है क्या?"

यह सुनना था कि उन दोनों लड़कों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे चिल्लाए, "तुम्हारी इतनी हिम्मत!" और वो दोनों झिंगा को मारने के लिए आगे आए।

अब यहां पर कोई आम इंसान होता तो डर जाता या लाठी-डंडा उठा लेता। पर हमारे झिंगा और भिंगा तो अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्होंने उन गुंडों पर हाथ तक नहीं उठाया। वे अपनी कुर्सी पर वैसे ही बैठे रहे और दारू पीते हुए, चखना खाते हुए ही खुद को उनके वार से बचाने लगे। जब पहला गुंडा मुक्का मारता, तो झिंगा दारू की चुस्की लेते हुए बस थोड़ा सा पीछे झुक जाता और मुक्का हवा में निकल जाता। जब दूसरा लड़का थप्पड़ मारने आता, तो भिंगा चखना मुंह में डालते हुए अपनी गर्दन टेढ़ी कर लेता।

पूरे मैखाने के लोग हैरान होकर देख रहे थे कि झिंगा भिंगा बिना उनपे हाथ उठाए, दारू पोते हुए ही, खाते हुए ही, खुद को एक्शन से बचाते हुए दारू का पूरा मजा ले रहे थे। सामने वाले मार-मार के, हवा में हाथ-पैर चला-चला के खुद ही थकने लगे थे।

3. गुंडों का सरेंडर और झिंगा-भिंगा का स्वैग

स्वैग


थोड़ी देर तक यह तमाशा चलता रहा। झिंगा और भिंगा की दारू की बोतल धीरे-धीरे खाली हो रही थी और उधर उन दोनों लड़कों की सांसें फूल रही थीं। वे दोनों मारने के चक्कर में खुद इतनी बुरी तरह थक गए कि उनके घुटने कांपने लगे। आखिरकार, जब उनसे और नहीं झेला गया, तो वे दोनों हांफते हुए पीछे हटे।

उनमें से एक लड़का अपनी कमर पर हाथ रखकर हांफते हुए बोला, "भैया लोग यार... आप लोग ही बैठ जाओ। हम लोग उधर चले जाते है, अब नहीं हो पाएगा हमसे। पता नहीं किस मिट्टी से बने हो, ना थकते हो ना मरते हो! भैया रे, सलाम है तुम दोनों को। बाय बाय!"

ऐसा बोलके वे दोनों चुपचाप अपनी इज्जत बचाकर बाजू वाले टेबल में जाकर लुढ़क गए, जैसे उनकी पूरी जान ही निकल गई हो। मैखाने के बाकी लोग तालियां बजाने लगे, लेकिन हमारे झिंगा और भिंगा को इन सब चीजों से कोई मतलब नहीं था। उन्होंने अपनी बोतल खत्म की, टेबल पर पैसे रखे और हमेशा की तरह वापस फिर से हाथ में हाथ थामकर "रिंगा रिंगा" गाते हुए वापस अपने घर की तरफ निकल गए। अब ये मस्त मिजाज और बेफिक्री इनका हर रोज का Routine ही है।

4. राजघराने का बंद संदूक और रानियों का प्लान

राजघराने का बंद संदूक और रानियों का प्लान


अब इस कहानी में एक बहुत बड़ा ट्विस्ट आता है। इसी मक्खनपुर गांव के एक कोने में एक बहुत बड़ा पुराना राजघराना था। उस राजघराने में दो बहनें रहती थीं, जिनका नाम था रानी और तानी। वे उस महल की मालकिन थीं। उनके घर में, यानी उस महल के एक गुप्त कमरे में एक बहुत ही पुरानी संदूक रखी हुई थी, जो उनके परदादा के जमाने की पड़ी हुई थी।

वह संदूक कोई आम संदूक नहीं थी, वह लोहे का एक भारी-भरकम ट्रंक बॉक्स (టంకు పెట్టె) था। उस संदूक पर एक ऐसा अजीब और मजबूत ताला लगा था, जिसको खोलने के लिए राजघराने के लोग बरसों से कोशिश कर रहे थे। अरे, बहुत लोगों से कोशिश करवाए, बड़े-बड़े ताला तोड़ने वाले एक्सपर्ट्स और बुद्धिमान लोग बुलाए गए, पर वह संदूक किसी से नहीं खुला। अच्छे-अच्छे लोग अपना पूरा जोर लगाकर थक गए, पर वो पुरानी संदूक टस से मस नहीं हुई।

महल की ऊंची खिड़की से रानी और तानी अक्सर गांव की तरफ देखती थीं। वे दोनों रोज झिंगा और भिंगा का यह मस्त मिजाज, उनका वो मैखाने वाला किस्सा और रात को हाथ में हाथ डालकर गाना गाते हुए जाना देखती रहती थीं। दोनों बहनें इन दोनों दोस्तों के इस बिंदास अंदाज से बहुत प्रभावित थीं।

एक दिन खिड़की पर खड़े होकर जब झिंगा-भिंगा नीचे से गाते हुए गुजर रहे थे, तो रानी ने तानी की तरफ देखा और कहा, "ये बहन, हम इस संदूक को खोलने के लिए अगर इन लोगों से ट्राई करवाते है, तो कैसा रहेगा? यह बहुत मस्त होगा।"

तानी ने थोड़ा सोचते हुए जवाब दिया, "हां, सोच तो सही है तेरी बहन... पर क्या इन बेवड़ों से हो पाएगा? हम तो इन्हें रोज देख रहे है, ये तो चौबीस घंटे अपनी ही धुन में रहते हैं।"

रानी ने मुस्कुराते हुए कहा, "अरे मस्त तो है बेहेन! किसी से कोई मतलब नहीं रखते ये लोग। ये दुनियादारी के प्रपंच से दूर हैं, और सच कहूं तो ये मुझे बहुत पसंद है।"

तानी भी थोड़ी शर्माई और बोली, "बात तो तेरी सही है, पसंद तो मुझे भी है। चलो ठीक है, कम से कम उस संदूक में है क्या, हमें यह तो पता चले कि उसके अंदर हमारे परदादा क्या छोड़के गए हैं।"

तभी रानी के दिमाग में एक बहुत ही शरारती और बड़ा आइडिया आया। उसने अपनी बहन का हाथ पकड़ा और एक बड़ी शर्त रखते हुए बोली, "चलो एक काम करते हैं। अगर इन दोनों से यह पुरानी संदूक की पेटी खुल गई... तो हम इन दोनों से शादी कर लेंगे, इनको अपना जीवनसाथी बना लेंगे!"

तानी ने भी मुस्कुराकर इस बात पर अपनी सहमति दे दी। राजघराने की दोनों राजकुमारियों ने अब मन बना लिया था कि वे इन दोनों मस्तमौला दोस्तों को महल में बुलाएंगी।

आगे क्या होगा?

क्या मक्खनपुर के ये दो बेवड़े दोस्त, जो सिर्फ दारू और अपनी धुन में मस्त रहते हैं, राजघराने के उस बरसों पुराने बंद संदूक को खोल पाएंगे? क्या झिंगा और भिंगा की किस्मत पलटने वाली है और उनकी शादी इन दो खूबसूरत राजकुमारियों से होगी? या फिर उस पुरानी संदूक के अंदर कोई ऐसा खतरनाक राज छुपा है जो इन दोनों की 'झिंगा झिंगा' लाइफ को हमेशा के लिए बदल देगा?

आगे क्या होगा यह जानने के लिए बहुत ही सस्पेंस और मजे के साथ पढ़ने के लिए इंतजार करिए part 2 का!


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