​मिथुना: द जंगल वे (Mithuna: The Jungle Way)

 

​मोटुपल्ली के पहाड़ी इलाके में गढ़ी गई "मिथुना

​मोटुपल्ली के पहाड़ी इलाके में गढ़ी गई "मिथुना" की कहानी सिर्फ जंगल का कोई रहस्य नहीं है; बल्कि यह एक लड़की के जीवन के संघर्ष, दर्द और अपने लोगों के लिए दिए गए एक महान बलिदान की दास्तान है। लोगों के विश्वास और एक छिपे हुए सच के बीच घूमती इस कहानी को आइए 5 मुख्य पॉइंट्स में समझते हैं।

​1. मोटुपल्ली जंगल का खौफ और मिथुना का गायब होना

​मोटुपल्ली के पहाड़ों में बसे इस घने जंगल से कभी आसपास के ग्रामीणों को बहुत डर लगता था। दरअसल, 25 साल पहले इस जंगल से जो भी गुजरता था, ठीक शाम के 6 बजे पेड़ों से कुछ अजीबोगरीब आवाजें आती थीं। उस भयानक आवाज के डर से कई लोगों का दिल दहल जाता था और हार्ट फेल होने से उनकी मौत हो जाती थी। इसी वजह से वहां तरह-तरह की भूतिया कहानियां बन गईं।

​ठीक 25 साल पहले, गांव में एक बड़ा त्योहार (जातरा) मनाया जा रहा था, तभी "मिथुना" नाम की लड़की के ऊपर अचानक माता सवार हो गई (पुनकम आया)। वह उसी बेसुध हालत में जंगल की तरफ भाग गई और फिर कभी लौटकर नहीं आई। लोगों ने मान लिया कि वह मर चुकी है और जंगल की देवी ने उसे खुद में समा लिया है, जो अब भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाती है। लोग जंगल में जाते वक्त सोचते कि "हमारे साथ मिथुना है ना" और इसी उम्मीद से हिम्मत रखकर आगे बढ़ जाते थे।

​2. उस रात का असली सच और अंजाने शहर का सफर

उस रात का असली सच और अंजाने शहर का सफर


​गांव वाले भले ही मिथुना को जंगल की देवी मान रहे थे, लेकिन उस रात की असलियत कुछ और ही थी। जिस वक्त मिथुना माता के कारण बेसुध होकर जंगल पहुंची, ठीक उसी समय शहर से आए कुछ चोरों ने उन आवाज करने वाले रहस्यमयी पेड़ों को काट दिया था और उन्हें एक लॉरी (ट्रक) में भर रहे थे। मिथुना को अपनी हालत के कारण कुछ पता नहीं चला और वह उन्हीं कटे हुए पेड़ों के ऊपर ही गिरकर बेहोश हो गई। चोरों को भनक तक नहीं लगी और वे लॉरी लेकर शहर चले गए। अगली सुबह जब मिथुना की आंख खुली, तो उसने खुद को अपने गांव से कोसों दूर, एक बिल्कुल अनजान शहर में पाया।

​3. शहर की मुश्किलें और एक फरिश्ते का सहारा

शहर की मुश्किलें और एक फरिश्ते का सहारा


​अपने माता-पिता और गांव से बिछड़कर वह बेचारी रोते हुए एक मां शीतला माता मंदिर के दरवाजे पर आकर सो गई। लेकिन वहां एक बेरहम आदमी उसे रोज प्रताड़ित (torture) करने लगा। दूर से एक भला आदमी यह सब देख रहा था। उस आदमी की कोई संतान नहीं थी, इसलिए मिथुना की हालत देखकर उसका दिल पसीज गया। उसने मिथुना को गोद (adopt) ले लिया, उसे खूब पढ़ाया-लिखाया और जीवन में इस काबिल बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

​4. 25 साल बाद गांव वापसी और एक बड़ा फैसला

देखने मोटुपल्ली लौटी


​जब मिथुना बड़ी और समझदार हो गई, तो वह 25 साल बाद अपने माता-पिता और गांव को देखने मोटुपल्ली लौटी। वहां आकर उसने देखा कि उन पेड़ों के कटने की वजह से जंगल में होने वाली मौतें पूरी तरह रुक चुकी हैं, लेकिन गांव के लोग आज भी मिथुना के नाम के सहारे ही जी रहे हैं। लोग पूरी हिम्मत से जंगल जाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि मिथुना उनकी रक्षा करती है।

​यह देखकर मिथुना खुश भी हुई और भावुक भी। उसने सोचा कि अगर वह आज सबके सामने आ गई और बताया कि वह जिंदा है, तो लोगों का यह अटूट विश्वास टूट जाएगा और उनके मन में पुराना डर फिर से लौट आएगा। वह अपने लोगों की उम्मीदों को तोड़कर फिर से मौत का मंजर नहीं देखना चाहती थी। इसलिए उसने फैसला किया कि जो जैसा चल रहा है, उसे वैसा ही रहने दिया जाए।

​5. माता-पिता के लिए गुप्त सेवा और कहानी का अंत

माता-पिता के लिए गुप्त सेवा और कहानी का अंत


​सच को हमेशा के लिए राज रखने का फैसला कर मिथुना चुपके से अपने कड़े माता-पिता के घर गई। वे उसे पहचान नहीं पाए, और वह एक अनजान की तरह उनके पैर छूकर वहां से चली गई। आज मिथुना शहर में अपना घर बसा चुकी है, लेकिन वह हफ्ते में एक बार अनजान बनकर अपने गांव आती है। अपने माता-पिता से मिलती है, उनकी हर संभव आर्थिक मदद करती है और बिना किसी को अपनी असली पहचान बताए चुपचाप वापस शहर लौट जाती है। उसने अपने गांव की खुशी और हिम्मत के लिए अपनी पूरी पहचान का बलिदान दे दिया।

​कहानी की सीख (Moral of the Story):

"अगर कुछ छुपाने से किसी का भला होता है या किसी की जिंदगी में खुशियां बनी रहती हैं, तो उस सच को जाहिर करके सबको तकलीफ देने से बेहतर है कि इंसान खुद खामोश रहकर उस दर्द


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