मिथुना: द जंगल वे (Mithuna: The Jungle Way) — Part 3
डिस्क्लेमर (Disclaimer):
📢 यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, जाति, धर्म, समुदाय या कानून व्यवस्था की छवि को ठेस पहुँचाना नहीं है। यह केवल सामाजिक जागरूकता और मनोरंजन के लिए लिखी गई है।
1. मोटुपल्ली में नया मोड़ और अमानवीय मंजर
जब विधायक तिवारी द्वारा गाँव के (मुखिया) के अपमान की पूरी बात मिथुना तक पहुँची, तो उसका सब्र टूट गया। उसने शहर में बैठकर तमाशा देखने के बजाय गाँव में रहकर ही इस जंग को लड़ने का फैसला किया। मिथुना इस बार अकेली नहीं आई, वह अपने पति के साथ सीधे मोटुपल्ली आ गई। लेकिन जैसे ही उसने जंगल के भीतर कदम रखा, वहाँ का मंजर देखकर उसकी आत्मा कांप गई।
मोटुपल्ली के हरे-भरे जंगल से लगभग 10,000 कीमती सागौन (Teakwood) के पेड़ बेरहमी से काटे जा चुके थे। लेकिन जो बात सबसे ज़्यादा रहस्यमयी और खौफनाक थी, वो कुछ और ही थी। जंगल के एक कोने में कई जंगली सुअरों की कटी हुई खालें (Skins) फेंकी हुई थीं। मिथुना को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जंगल के पेड़ों को काटना तो समझ आता है कि लकड़ी के लालच में हो रहा है, मगर सुअरों को मारना और उनकी बिना खाल की लाशें ले जाने का क्या माजरा है? यह बात उसके पल्ले नहीं पड़ रही थी।
उसने कानून पर एक आखिरी भरोसा जताते हुए इस बार दो और लेटर लिखे। यह अर्जी सीधे ज़िला कलेक्टर और विपक्ष (Opposition) के MLA को भेजी गई। वही मुखिया और वही 10 गाँव वाले उम्मीद लेकर कलेक्टर ऑफिस और विपक्ष के विधायक के पास पहुँचे, पर वहाँ भी कोई बात नहीं बनी। सिटिंग MLA तिवारी ने अपने रसूख और खौफ के दम पर पहले से ही उन सबकी ज़ुबान पर ताला लगा दिया था । सिटिंग म एल ये का खौफ सबको दबा कर रखा हुआ है फिलहाल कोई भी तिवारी के सामने खड़ा नहीं हो सकता
2. बाप-बेटी का मिलाप और पहचान का सच
सिस्टम के सारे दरवाज़े बंद देखकर गाँव वाले निराश थे, पर असली तूफ़ान तो मिथुना के घर में आना बाकी था। यह सब देखकर मिथुना के बूढ़े पिता उसके पास आए। उनकी आँखों में बरसों का दर्द और एक अजीब सी चमक थी। उन्होंने मिथुना के कंधे पर हाथ रखा और रोते हुए दर्द भरी आवाज़ में बोले:
पिता: "मिथुना... तुम मेरी बेटी मिथुना हो, मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूँ। अब मुझसे अपने आप को और मत छुपाओ। मैंने इतने दिनों से तुमसे कुछ पूछा नहीं, पर एक बाप अपनी औलाद को हर रूप में पहचान लेता है... मैं सब जानता हूँ बेटी।"
यह सुनते ही मिथुना के सब्र का बांध टूट गया। वह अपने पिता के गले लगकर बिलबिलाकर कर रो पड़ी।
Midhuna (रोते हुए): "हाँ पापा... मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं बस सही वक़्त का इंतज़ार कर रही हूँ। अभी के लिए सब कुछ ऐसे ही चलने दीजिए, जैसे चल रहा है। हमें पहले मोटुपल्ली की इस भयानक समस्या को सुलझाना है, गाँव को बचाना है..."
दोनों बाप-बेटी काफी देर तक गले लगकर रोते रहे। बरसों का छुपा हुआ दर्द आँसुओं के रास्ते बह गया। फिर पिता ने अपनी धोती के छोर से अपनी आँखें पोंछीं और मिथुना के आँसू साफ़ करते हुए कहा:
पिता: "बस बेटी, अब अपनी आँखों को पोंछ लो। रोना बंद करो। आगे का तुम्हारा यह कर्तव्य बहुत कठिन है, तुम्हें बहुत बड़ी लड़ाई लड़नी है।"
Midhuna: "हाँ पापा, मैं पीछे नहीं हटूंगी। मैं अपने इस कर्तव्य को हमेशा से निभा रही हूँ और आख़िरी सांस तक निभाऊंगी।"चाहे कुछ भी हो जाए मै हार नहीं मानूंगी मै हमारे गांव के लिए लडूंगी जब तक हमारे गांव को न्याय न मिले तब तक लडूंगी
अब मिथुना के पास उसका परिवार था, उसका मायका था और उसका पूरा गाँव था। अब मिथुना इस जंगल के कंटीले रास्ते पर अकेली नहीं थी।
3. खुले आसमान के नीचे महा-पंचायत और भोर का संकल्प
रात को सब लोग खाना खाकर अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए। खुले आसमान के नीचे सबने अपनी-अपनी खटिया (खाट) एक जगह लगा ली। पूरा मोटुपल्ली गाँव आज एक बड़े परिवार की तरह एकजुट बैठा था। तभी मिथुना खड़ी हुई और उसकी आवाज़ में एक नेतृत्व की गूँज थी:
Midhuna: "सुनो गाँव वालों! हमारी मदद का हर रास्ता बंद हो चुका है। नेता, कानून, सब बिक चुके हैं। हमारा गाँव, हमारा जंगल और ये बेजुबान जानवर इस वक़्त बहुत बड़े खतरे में हैं।"
गाँव वाले: "अब हम क्या करेंगे मिथुना? तुम ही बताओ, तुम पढ़ी-लिखी हो, तुम जैसा कहोगी हम वैसा ही करेंगे, तुम्हारी हर बात सुनेंगे।"
Midhuna: "देखो, हमें ना तो किसी व्यवस्था से दुश्मनी है, ना किसी राजनीति से और ना ही किसी नेता से। हमें सिर्फ और सिर्फ अपना जंगल और अपना गाँव बचाना है। यह ज़मीन हमारे पुरखों की है, यह हमारी है और इस पर सिर्फ़ हमारा हक़ है! हम प्रकृति के बच्चे हैं और यह जंगल हमारी माँ है... हम अपनी माँ की जान को इस तरह जाते हुए चुपचाप नहीं देख सकते! और ये बेजुबान जानवर... ये कोई पराए नहीं हैं, ये सदियों से हमारे इसी परिवार का हिस्सा रहे हैं। हम हमेशा से इन्हें बचाते आए हैं और आगे भी बचाएंगे। अगर यह जंगल कट गया ना, तो शहरों के लिए ऑक्सीजन की बहुत भारी कमी हो जाएगी!"
गाँव वाले: "बात तो तुम बिल्कुल सोलह टके सच कह रही हो मिथुना।"
Midhuna: "अगर इंसानों की नस्ल को बचाना है, तो हमें हर हाल में इस जंगल को बचाना ही होगा!"
उसी रात, सुबह के ठीक 4 बजे गाँव के प्राचीन माता के मंदिर में एक विशेष पूजा रखी गई। पूजा संपन्न होने के बाद, मिथुना और गाँव वालों ने मिलकर मंदिर की एक पवित्र दीवार पर कोयले और सिंदूर से एक बेहद भावुक विनती लिखी:
"हे जंगल की देवी! न हम किसी बेजुबान की बलि देंगे, और न ही हम खुद कोई हिंसा करेंगे। हम गाँव वाले यहाँ सिर्फ एक सच्ची मन्नत लिख रहे हैं कि हमें इस पवित्र जंगल को विनाश से बचाने में सफलता मिले। बस आपका आशीर्वाद हमेशा हमारे सिरों पर बना रहे, हमारे लिए इतना ही काफी है।" है मां हमारा साथ देना ।
4. कुदरत का महा-इंसाफ और मोटुपल्ली की जीत
अगली सुबह जब वो तस्कर जंगल काटने आए, तो पूरे गाँव वालों ने बिना कोई मारपीट किए उन्हें चारों तरफ से घेरकर बंधक बना लिया। जब उनसे कड़ाई से पूछा गया कि— "यह माजरा क्या है? और इसके पीछे कौन है?" तब तस्करों ने जो सच उगला, उसने सबके होश उड़ा दिए। उन्होंने कबूल किया कि इन जंगली सुअरों के मांस और सागौन की लकड़ी को शहर के एक बहुत बड़े बिजनेस टाइकून (Business Tycoon) के पास भेजा जाता है, जहाँ एक ऐसी दवा पर एक्सपेरिमेंट हो रहा है जिससे इंसानों के बुढ़ापे को काबू किया जा सके!
लेकिन मिथुना इस बार पूरी तैयारी के साथ आई थी। उसने जंगल में पहले से ही जो एडवांस ड्रोन कैमरे (Drone Cameras) छुपा रखे थे, उन्हें बहुत सारे सर्वर्स से जोड़कर पूरे जंगल का हाल और तस्करों का कबूलनामा... सब कुछ LIVE ब्रॉडकास्ट कर दिया! देखते ही देखते यह लाइव फीड पूरी दुनिया और देश के सुप्रीम कोर्ट (न्यायस्थान) तक पहुँच गई।
मिथुना ने कैमरे के सामने आकर गरजती हुई आवाज़ में उस बिजनेस टाइकून को ललकारा:
Midhuna: "आप लोग होते कौन हो बुड्ढों को जवान बनाने वाले? पूरी कुदरत को कुर्बान कराकर सिर्फ अमीर बुड्ढों को जवान बनाकर क्या हासिल करोगे? जब यह प्रकृति ही मर जाएगी, तो इस नकली जवानी और पैसों का तुम क्या करोगे? क्या कल को सांसें चलाने के लिए भी कोई दवाई बनाओगे? क्या पेट भरने के लिए कोई केमिकल की गोली बनाओगे? तुम सब होते कौन हो ऊपर वाले की इस खूबसूरत बनावट से छेद चाड करने वाले? हमें न्याय चाहिए!"
इस खौफनाक सच ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। दबाव इतना बढ़ा कि खुद देश का न्यायस्थान (Court) मोटुपल्ली के जंगलों तक पहुँच गया। कोर्ट से सीधा आदेश आया— वन संरक्षण अधिनियम के तहत जंगल की कटाई पर तुरंत रोक लगाई जाए और उस बिजनेस टाइकून के सारे लाइसेंस रद्द कर उसे कड़ी सज़ा दी जाए।
जिस विधायक तिवारी और कलेक्टर ने कल गाँव वालों की अर्जी को डस्टबिन में फेंका था, आज वही लोग सरकारी आदेश के तहत मोटुपल्ली में अपने हाथों से पक्की सड़कें बनवा रहे थे। सरकार की तरफ से जंगल के चारों तरफ सुरक्षित फेंसिंग की गई, पक्के घर बनाए गए, अस्पताल, पुलिस स्टेशन और फॉरेस्ट ऑफिस लागू किए गए। सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि मोटुपल्ली के हर घर के एक-एक नौजवान को सिर्फ अपने गाँव में रहकर किसानी और प्रकृति की रक्षा करने के लिए सरकार खुद सरकारी सैलरी (Government Salary) देने लगी।
अब मोटुपल्ली के गाँव वालों को अच्छी तरह पता है कि उनके जंगल की रानी को कोई भगवान ऊपर नहीं ले गए हैं, वह साक्षात रूप में आज भी उन्हीं के बीच खड़ी है।
Thank you, Mithuna for this change!
ये हैं मेरे देश के वन, जो पूरी दुनिया को खुलकर सांस देते हैं!
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