मिथुना: द जंगल वे (Mithuna: The Jungle Way) — Part 2
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📢 यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका मकसद किसी भी व्यक्ति, जाति, धर्म, समुदाय या कानून व्यवस्था की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं है। यह कहानी सिर्फ एक सामाजिक चिंतन और मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई है।
1. इतिहास का खौफनाक दोहराव और मोटुपल्ली में हाहाकार
मिथुना ने अपने जीवन का सब कुछ, अपनी जवानी, अपनी खुशियाँ और अपनी असली पहचान अपने ही गांव के लिए पूरी तरह से त्याग दिया था। मोटुपल्ली के उस भोले-भाले समाज में आज भी लोग मिथुना को कोई साधारण लड़की नहीं, बल्कि जंगल की एक अदृश्य और चमत्कारी देवी के रूप में ही जानते हैं। मिथुना हर हफ्ते शहर के अपने आलीशान जीवन को छोड़कर, चुपके से इस पिछड़े गांव में आती थी। वह अपने बूढ़े माता-पिता से बस ऐसे ही एक अजनबी आत्म-संबंधी की तरह मिलती, उनका अच्छा-बुरा हालचाल पूछती, उनकी आर्थिक मदद करती और फिर वापस शहर चली जाती थी। मिथुना के लिए उसका यह सिद्धांत और मर्यादा बहुत मायने रखती थी। वह उस पूरे गांव को खुश और भयमुक्त देखकर खुद के अंदर एक अजीब सी शांति महसूस करती थी।
पर अब अचानक मोटुपल्ली की वादियों में वही खौफनाक मंजर फिर से दोहराने लगा था, जो पहले बचपन में उसके साथ हुआ था। मोटुपल्ली के घने और कीमती जंगलों में अब रातों-रात पेड़ों को अवैध रूप से काटने का एक काला और खौफनाक सिलसिला फिर से शुरू हो गया है। रात के सन्नाटे में कुल्हाड़ियों और आरी की आवाजें गूंजने लगी है। सुबह होते ही गांव वालों को जंगल का एक बड़ा हिस्सा उजड़ा हुआ दिखता है। इस वजह से मोटुपल्ली में तो जैसे हाहाकार मची हुई है। लोग डर के मारे कांप रहे है। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि जो लोग पहले बड़ी-बड़ी बातें करते थे कि जंगल की रानी मिथुना हमारी हर पल रक्षा कर रही है, अब मुसीबत आते ही उन लोगों की सोच बदल गई। अब वो लोग मिथुना की शक्ति पर नहीं, बल्कि मिथुना का नाम लेकर साक्षात भगवान के अस्तित्व को ललकार रहे है कि "आखिर भगवान कहाँ है? हमारी देवी कहाँ छुप कर बैठी है?" कहा चली गई जंगल की रक्षक मिधुना
2. मुखिया से तीखी बहस और आस्था का पाखंड
मिथुना उस समय जब हर हफ्ते की तरह अपने माता-पिता से मिलने गांव आई थी, तो गांव के चौराहे पर लोगों के मुंह से ऐसे कायरता और अंधविश्वास से भरे शब्दों को सुनकर उसका मन उथल पुथल पानी पानी और आग हो गया। उसका खून खौल उठा कि जिस गांव के लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी, वो लोग इतनी जल्दी अपनी आस्था से मुकर गए। वह खुद पर काबू नहीं रख पाई और सीधे मोटुपल्ली के मुखिया के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसने मुखिया से समाज के इस दोहरे रवैये पर सीधे सवाल कर दिया:और बोल उठी उसने आवाज उठाई
Midhuna: "वाह मुखिया जी! बहुत खूब! पहले तो आप लोग बड़ी-बड़ी डींगें हांकते थे कि जंगल की देवी हमारी रक्षा करती है। आप लोगों ने ही तो मिथुना को जंगल की रानी बना दिया है कह कर उसकी जगह-जगह पूजा करना शुरू किया था। आज अचानक क्या हो गया?" कहा गया तुम लोगों का भरोसा तुम्हारा आस्था और वो विश्वास जो मिधुना के पहले उस देवी पे हुआ करता था
मुखिया को एक बाहरी और अनजान लड़की का इस तरह सबके सामने सवाल उठाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अपनी लाठी जमीन पर पटकी और गुस्से से लाल होकर बोला:
Mukhiya: "तुम चुप रहो लड़की! तुम्हें क्या ही पता है इस गांव के इतिहास और हमारी तकलीफों के बारे में? तुम ना तो इस गांव की रहने वाली हो और ना ही इस मिट्टी से तुम्हारा कोई खून का नाता है। तुम तो शहर की रहने वाली हो, जो यहाँ सिर्फ अपना मनोरंजन करने के लिए हमारे गांव आती हो। अब तुम्हारा मनोरंजन खत्म हो गया है, तो तुम चुपचाप यहाँ से निकल जाओ। तुम हमसे कोई भी सवाल पूछने का कोई अधिकार नहीं रखती हो।"
मुखिया के इस अहंकार और रूखेपन ने मिथुना के अंदर के दर्द को और गहरा कर दिया। उसने मुखिया की आँखों में आँखें डालकर और भी कड़े लहजे में कहा:
Midhuna: "ऐसे कैसे मेरा कोई अधिकार नहीं होगा? मैं सवाल करूंगी, और बार-बार करूंगी क्यों ना करूं? जिस जंगल की देवी की बात आप लोग रात-दिन करते हो, क्या उसकी जवानी के उस महान त्याग का आपकी नज़र में कोई मोल नहीं है? क्या उसके उस मासूम बचपन के छिन जाने का कोई मोल नहीं है, जो इस जंगल की भेंट चढ़ गया?" पता नहीं क्या हुआ क्या नहीं हुआ कोई उसे ढूंढा तक नहीं और उसे जंगल की रानी बिना देखे बिना समझे बस बना दिया कहानी बना कर इंसान को देवी बना दिया आज कोई सवाल कर रहा है तो मुंह बंद कर रहे हो
मुखिया ने हाथ हवा में लहराया और उपहास उड़ाते हुए कहा:
Mukhiya: "कौन सी देवी? और कहाँ की देवी? वो देवी जो बचपन में गायब हुई थी, वो सचमुच कहाँ गई थी, आज तक यह बात इस गांव में किसी को पता तक नहीं है। सब मनगढ़ंत बातें हैं। अगर वो सच में इस जंगल की इतनी बड़ी रखवालन होती, तो आज जब चोर हमारे जंगल काट रहे हैं, तो वो हमें इस तरह लाचार और बेसहारा छोड़कर क्यों बैठती?"
Midhuna: "मतलब आपके कहने का यह है कि इतने सालों का उसका वह एकाकी त्याग इस गांव के लिए कोई मोल नहीं रखता?"चाहे आगे पीछे जो भी हो इसका मुझे नहीं पता पर उसका बचपन तो गायब हो गया ना क्या इस चीज का कोई महत्व नहीं
Mukhiya: "हाँ, नहीं रखता! आज की इस मुसीबत के सामने उसके बीते हुए कल के त्याग का किसी भी तरह का कोई मोल नहीं है!"
3. मिथुना का भयंकर आक्रोश और समाज को करारा आईना
मुखिया के मुंह से अपने ही त्याग का ऐसा अपमान सुनकर अब मिथुना पूरी तरह से बौखला गई। उसके सब्र का बांध टूट गया। वह पूरे गांव के सामने शेरनी की तरह चिल्लाई और कड़कती आवाज में बोली:
Midhuna: "ऐ मोटुपल्ली के जंगली इंसानों, ज़रा कान खोलकर पूरे होश में मै जो कह रही हु उसे सुनो! जब तक तुम लोगों की जिंदगी बिना किसी मुसीबत के एकदम सही और सुख-चैन से चल रही थी, तब तक तुम लोगों ने मंदिर में जाकर बड़े-बड़े फूल चढ़ाए, ढोंग किया। तुम लोगों ने कभी निस्वार्थ भाव से भगवान को नहीं माना, बल्कि भगवान से तुम लोगों ने हमेशा अपनी आस्था का एक घटिया व्यापार किया है! ढोंग किया तुम लोगों ने भगवान के साथ मंदिर को एक बाजार बना कर भगवानों का व्यापार किया है कभी मेला लगाकर तो कभी गांव की बेटी को जंगल में ढूंढ कर खिलवाड़ है ये भगवान से।
जब तक तुम लोग सुखी थे, तब तक भगवान का नाम अपनी इस स्वार्थी और काली जुबान के ऊपर पूरे पाखंड और श्रद्धा से सजाकर रखा था।"
"25 साल पहले जब वो छोटी और मासूम लड़की इस भयानक जंगल में खो गई थी, तब तुम लोगों ने उस बच्ची को ढूंढने की ज़रा सी भी कोशिश नहीं की। अपनी ज़िम्मेदारी से भागने के लिए तुम लोगों ने उस बच्ची को ढूंढना छोड़ कर भगवान के नाम पर एक झूठी कहानी गढ़ दी। वह बच्ची आज जिंदा है कि मर गई, वह किस हाल में है—यह पता लगाना छोड़ कर उस मासूम बच्ची की आत्मा पर तुम लोगों ने अपनी झूठी श्रद्धा का यह भारी बोझ उसके माथे पर थोप दिया। अपनी कायरता छुपाने के लिए जबरदस्ती उस बच्ची को जंगल की देवी बना दिया। और आज, आज जब तुम्हारे इस विश्वास और आस्था के इम्तिहान की असली बारी आई, तो तुम लोगों ने अपनी सारी श्रद्धा को पल भर में मिट्टी में मिलाकर उसकी समाधि बना दी!"
"कोई बाहरी दुश्मन आकर सरेआम तुम्हारा जंगल काट रहा है, तुम्हारी प्रकृति और तुम्हारा घर उजाड़ रहा है, और तुम लोग बुज़दिलों की तरह, गवारों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठकर भगवान को ललकार रहे हो? अपनी जन्मभूमि के लिए लड़ना छोड़कर, उन चोरों को आगे बढ़कर रोकना छोड़कर, अपनी सारी नाकामी का दोष भगवान के मढ़ रहे हो? अरे! इस दुनिया में तो एक सगी माँ भी बिन मांगे बच्चे की थाली में खाना नहीं देती। कैसे अजीब और गिरे हुए इंसान हो तुम लोग? खुद कोशिश करना और अपनी सुरक्षा के लिए लड़ना छोड़कर यहाँ खड़े होकर फालतू की बहस कर रहे हो!" कब लाडो जी खुद के लिए ।
4. व्यवस्था की आखिरी अर्जी और राजनीति का गंदा चेहरा
ऐसा जोरदार भाषण देकर और गांव वालों को उनकी औकात दिखाकर मिथुना गुस्से में पैर पटकती हुई वापस अपने घर की तरफ चली गई । रास्ते भर उसका दिमाग तेजी से चल रहा था। वह चलते-चलते उस सुनसान रास्ते को देखती है और सोचती है कि लाठी उठाने से पहले क्यों न कानून का सहारा लिया जाए? क्यों न मुखिया के हाथों इस क्षेत्र के सिटिंग MLA को एक लिखित अर्जी भेजी जाए, जिसमें इस जंगल की बर्बादी और गांव की बदहाली की सारी शिकायतें साफ़-साफ़ लिखी हों। मिथुना पढ़ी-लिखी थी, इसलिए उसने रात को अपने कमरे में आराम से बैठकर, शब्दों को तौलकर विधायक के नाम एक बेहद गंभीर पत्र लिख दिया:
अंतिम निवेदन पत्र:
"माननीय महोदय और हमारे विधानसभा वर्ग के लोकप्रिय MLA तिवारी जी को सादर सम्मान के साथ यह पत्र लिखना है कि—
महोदय, हम सभी मोटुपल्ली नाम के एक बेहद छोटे और सुदूर इलाके के गांव से आते हैं। हमारे गांव की कुल आबादी सिर्फ 750 लोगों की है और यहाँ तकरीबन छोटे-बड़े मिलाकर 45 घर हैं। एक बेहद छोटा और पिछड़ा गांव होने की वजह से यहाँ आम जन-संख्या का आना-जाना बहुत ही कम है। इसके अलावा, यह गांव चारों तरफ से घने जंगल के बीचों-बीच बसा होने की वजह से आज तक सरकार की विकास योजनाएं और प्रशासन की नजर इस पर बहुत कम पड़ी है। हम समस्त मोटुपल्ली ग्रामवासी आज इस संकट की समय में सब मिलकर आपसे नम्र निवेदन करते हैं कि आप हमारे जंगलों में रातों-रात होने वाली इन कीमती पेड़ों की अवैध कटौती को तुरंत रोकें और हमारे गांव के संपर्क के लिए मुख्य सड़क से जोड़ती हुई एक पक्की रोड बनवाकर दीजिए। हमें पूरा विश्वास है कि मोटुपल्ली ग्रामवासियों का यह छोटा सा निवेदन आप स्वीकार करेंगे।
— मोटुपल्ली के समस्त ग्रामवासी"
फिर अगले दिन सुबह होते ही मिथुना वापस मोटुपल्ली गांव चली जाती है। वह सीधे मुखिया के पास पहुँचती है और यह ऑफिशियल लेटर मुखिया के हाथ में सौंपकर कड़े शब्दों में कहती है कि, "जाओ मुखिया जी, ये विन्नप लेखा (अर्जी) ले लो। इस पर गांव के सभी बड़े-बुजुर्गों के हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान लगवाओ, और गांव के कम से कम 10 जिम्मेदार लोगों को अपने साथ लेकर सीधे शहर जाकर MLA साहब के दफ्तर में इसे देकर आइए।"
मुखिया को भी बात सही लगती है। वह गांव के 10 रसूखदार लोगों को साथ लेता है और शहर में सिटिंग MLA तिवारी के आलीशान बंगले पर पहुँच जाता है। काफी देर इंतजार करने के बाद जब मुखिया विधायक जी के सामने वो लेटर रखता है, तो सिटिंग MLA तिवारी लेटर को खोलकर सरसरी नज़र से देखता है। पत्र पढ़ते ही उसके चेहरे पर अहंकार और गुस्सा साफ़ दिखने लगता है। वह लेटर को मेज पर जोर से पटकता है और गरजकर बोलता है:
MLA Tiwari: "तुम्हारा ये लेटर हम किसी भी कीमत पर एक्सेप्ट नहीं करेंगे! तुम लोगों की इतनी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? पिछली बार जब मैं चुनाव के दौरान तुम्हारे मोटुपल्ली गांव में वोट मांगने आया था, तो तुममें से किसने मुझसे कहा था कि हममें से कोई भी तुम्हें वोट नहीं देगा? तुमने भरे समाज में मुझसे सवाल किया था कि आखिर तुमने पिछले पांच सालों में हमारे गांव के लिए किया ही क्या है? उस वक्त तुम लोगों ने मुझे वहां से दुत्कारा था ना? अब जाओ, जिसको बताना है बता लो, जिससे शिकायत करनी है कर लो, ये तुम्हारी अर्जी यहीं रद्दी के भाव जाएगी और आगे नहीं बढ़ेगी! तुम जैसे छोटे और low caste लोगों की औकात ही क्या है जो मेरे दफ्तर में आकर हुक्म चलाओगे? ऊपर से अब तुम लोग मुझसे अर्जियां भी लिखवाने लगे हो! कान खोलकर सुन लो मुखिया, अगर मैं तुम्हारे गांव में पक्की रोड, बिजली, सड़कें और पानी जैसी सारी सुविधाएं दे दूंगा, तो तुम जैसे नीच लोग दोबारा हाथ जोड़कर मेरे पास आओगे ही क्यों? अपनी औकात में रहो और निकलो जाओ यहाँ से अभी के अभी मै तुम लोगों को एक मिनट भी नहीं देखना चाहता और ना तुम्हारी परेशानियां सुना चाहता हु!"
MLA तिवारी गुस्से में लाल होकर अपने सुरक्षाकर्मियों को इशारा करता है और मुखिया समेत उन 10 गांव वालों को धक्के मारकर अपने दफ्तर से बाहर भगा देता है। मुखिया और गांव वाले आज पहली बार अपनी जाति और लाचारी के कड़वे सच से वाकिफ हुए थे। उनके पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था।
अब हम Part 3 में विस्तार से देखेंगे कि कानून और व्यवस्था से पूरी तरह हारने के बाद, जब यह बात मिथुना को पता चलेगी, तो आगे क्या हुआ... क्या मिथुना अब साक्षात महाकाली का रूप धारण करेगी?
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