​भैरवपुर का भैरव: सात साल का रक्त-तर्पण... एक बैरागी की प्रेम जीत!

 

घोषणा (Disclaimer): यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन या वास्तविक घटना से कोई संबंध नहीं है।


Varshi puja me
Bhairava  pur ka Bhairav story



​1. बैरागी का जन्म - एक दिव्य प्रतिरूप

​भैरवपुर नाम के एक गाँव में 20 साल का 'बैरागी' नाम का एक लड़का रहता था। उसके पैदा होने से ठीक एक दिन पहले उसकी माँ को एक सपना आया था। उस सपने में साक्षात् भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने बैरागी के कमरे में एक दिव्य छवि (प्रतिरूप) दिखाई। इसी कारण उसका नाम 'बैरागी' रखा गया। वह शिव का सच्चा भक्त और बेहद सीधा-साधा था। उसने शिव को ही अपना सबसे अच्छा दोस्त और भाई मान लिया था। इस पूरी दुनिया में, जब शिव उसके साथ थे, तो उसे किसी और की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी।

​2. सांसारिक माया से कोसों दूर...


Bhairav tapasya me
Bhairav sacha bhakat



​बैरागी हमेशा अपनी ही भक्ति में लीन रहता था। वह शिव मंदिर के ठंडे फर्श पर ही सो जाता और अपनी ही धुन में मस्त-मगन रहता था। "यह दुनिया चाहे कुछ भी करे, हमें क्या?"—यही उसकी सोच थी। सांसारिक मोह-माया और पारिवारिक बंधनों से कई कदम आगे निकला हुआ, 20 साल का वह एक वैरागी मन का इंसान था।

​3. 30 शादी के रिश्तों का इनकार

​बैरागी के माता-पिता उसकी शादी को लेकर हमेशा बहुत चिंता में रहते थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा जिम्मेदारी संभाले, घर बसाए और वंश को आगे बढ़ाए। लेकिन वे जब भी कोई शादी का रिश्ता लेकर आते, बैरागी साफ मना कर देता। देखते-देखते उसने लगभग 30 रिश्ते एक ही झटके में ठुकरा दिए। उसके लिए तो बस शिव मंदिर का वह सुकून ही उसकी पूरी जिंदगी बन चुका था।

​4. गुंडों का आतंक - रास्ते में रक्षक

8 baar rokne ka prayas
Pehle rokne ka prayas 8 baar


​एक दिन जब बैरागी रास्ते से गुजर रहा था, उसने देखा कि कुछ आवारा लड़के 'वर्शी' नाम की एक बेहद खूबसूरत लड़की को घेरकर परेशान कर रहे थे।

गुंडा: "ऐ लड़की! शराफत से पैसे निकालती है या फिर तुझे कहीं बेचकर अपना फायदा निकालें?"

वर्शी (रोते हुए): "प्लीज... मुझे जाने दो। मेरे पास कुछ नहीं है!"

​बैरागी बड़े ही शांत स्वभाव और विनम्रता से उन गुंडों के सामने गया।

बैरागी: "भाई साहब, यह गलत है। वह एक लड़की है, उसे जाने दीजिए।"

गुंडा (हंसते हुए धक्का देकर): "अरे ओ झंडूवाम! बड़ा आया नीति का पाठ पढ़ाने। जा, अपना काम कर!"

​बैरागी ने बड़े सब्र के साथ उन्हें 7 बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। वर्शी ने डर के मारे रोते हुए बैरागी की तरफ देखा।

वर्शी: "मुझे बचाओ... प्लीज मुझे छोड़कर मत जाओ!"

​तब बैरागी ने 8वीं बार अपनी आखिरी चेतावनी दी।

बैरागी (गंभीर आवाज में): "मैं आखिरी बार कह रहा हूँ मेरे भाइयों, अगर इस बार नहीं सुने तो मुझे ना चाहते हुए भी आप लोगों को मारना पड़ेगा।"

​गुंडे नहीं माने और उस पर झपट पड़े, तभी बैरागी ने अपना रौद्र रूप दिखाया और मार-मारकर सबको जमीन पर गिरा दिया। लेकिन उसने उन्हें जान से नहीं मारा, बस इतना मारा कि वे कुछ पलों के लिए उठ ना सकें। इतनी ताकत दिखाने के बाद भी बैरागी ने हाथ जोड़ लिए।

बैरागी: "मुझे माफ करना मेरे भाइयों... मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहता था, लेकिन हालात ने मुझे मजबूर कर दिया।"

​इसके बाद बैरागी, वर्शी को उसके घर छोड़ आया। ताज्जुब की बात यह थी कि वर्शी का घर बैरागी के घर के ठीक सामने ही था। लेकिन शिव भक्ति में डूबे बैरागी ने आज तक कभी उस पर ध्यान ही नहीं दिया था। बैरागी का यह सब्र, उसका भोलापन और उसकी बहादुरी वर्शी के दिल को छू गई। उसे बैरागी से सच्चा प्यार हो गया। अब हर सुबह वह सुंदर साड़ी पहनकर, हाथ में नारियल, दूध और फूल लेकर शिव मंदिर जाती और सुबह-शाम महादेव से मन्नत में सिर्फ बैरागी को मांगती। बैरागी यह सब चुपचाप देखता रहता था।

​5. पांच साल का इंतजार - दोनों के बीच संवाद

Apna dard Shiva ke samne
Intezar me varshi


​इसी तरह देखते-देखते 5 साल बीत गए। एक दिन वर्शी का सब्र टूट गया और उसने सीधे मंदिर में ही बैरागी को रोक लिया।

वर्शी (आँखों में आँसू लिए): "और कितने कठोर बनोगे बैरागी? क्या तुम्हें मेरी यह तड़प दिखाई नहीं देती? क्या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कभी कोई जगह नहीं बन पाएगी?"

बैरागी: "तुम क्यों 5 सालों से मुझे इस तरह परेशान कर रही हो वर्शी? मुझे अपनी धुन में रहने दो। मुझे इस संसार के मोह-माया के बंधन में नहीं बंधना।"

वर्शी: "इसमें मोह कहाँ है बैरागी? यह तो मेरा पवित्र और सच्चा प्यार है। मैंने तुम्हें अपनी जान से ज्यादा माना है।"

बैरागी (नजरें झुकाकर): "तुम घर जाओ वर्शी।"

​6. सातवें साल का रक्त-तर्पण - पिता का गुस्सा

​इसके बाद 2 साल और बीत गए। यानी पूरी तपस्या को 7 साल हो चुके थे। सातवें साल के आखिरी दिन वर्शी ने मन में पक्का फैसला कर लिया था कि आज वह बैरागी से विवाह करके ही रहेगी। वह शिव मंदिर में घुटनों के बल बैठ गई और बिना कुछ खाए-पिए, भूख-प्यास से बेहाल होकर दिन-रात महादेव से बैरागी को मांगती रही। दर्द इतना बढ़ गया कि उसके घुटनों से खून बहने लगा और वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।

​जब एक दिन और एक रात बीतने पर भी वर्शी घर नहीं लौटी, तो दोनों परिवारों के लोग ढूंढते हुए मंदिर पहुंचे। फर्श पर बिखरा खून और वर्शी की यह हालत देखकर सबकी आँखों में आँसू आ गए। तब बैरागी के पिता का गुस्सा और दर्द फूट पड़ा और वे बैरागी पर गरज उठे।

पिता (आक्रोश में): "अब बहुत हो गया बैरागी! तुम हमारे इकलौते बेटे हो, इसलिए आज तक हम चुप रहे। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। हमारे लिए तुमसे ज्यादा यह वर्शी मायने रखती है। जब से इसने तुमसे प्यार किया है, हमने इसे अपने दिल में बेटी और बहू का दर्जा दे दिया था!"

बैरागी (शांत): "पिताजी..."

पिता (बीच में टोकते हुए): "चुप रहो! तुम जिस महादेव की पूजा करते हो, क्या उन्होंने तुम्हें इतना कठोर होना सिखाया है? तुम्हारे आराध्य देव शिव की भी अर्धांगिनी (माता पार्वती) हैं, उनके भी बच्चे गणेश जी और कार्तिकेय जी हैं। फिर तुमने उनसे क्या सीखा? भक्ति का मतलब दुनिया को त्यागना नहीं होता बैरागी, दुनिया को समझना होता है! सबके बीच रहकर खुद में भगवान का वास बनाना होता है। वर्शी ने तुम्हारे लिए खुद को मिटा दिया। आज अगर तुम घर आओगे, तो मर्यादा पूर्वक वर्शी को वरमाला पहनाकर ही लाओगे। तुम्हारी माँ चौखट पर दीया जलाकर तुम दोनों का इंतजार करेगी!"

​पिता अपनी बात कहकर सबको साथ लेकर चले गए। तब मंदिर के पुजारी बैरागी के पास आए।

पुजारी: "बेटा बैरागी, पिता की आज्ञा ना मानना तुम्हारे आराध्य महादेव का अपमान होगा। तुमने अपनी भक्ति तो पूरी शिद्दत से निभाई, अब माता-पिता की बात मानकर अपना गृहस्थ कर्तव्य निभाओ। इसी में शिव का सच्चा सम्मान है।"

​7. अर्धांगिनी बनी वर्शी - सुखद अंत


​पुजारी और पिता की बातें सुनकर बैरागी का दिल पिघल गया। पहली बार उसकी आँखों से भी आँसू छलक आए। उसने आगे बढ़कर वर्शी को उठाया, उसे पानी पिलाया और बेहद प्यार से कहा।

Khoon me lath path varshi
Khoon se lath path varshi


बैरागी: "मुझे माफ कर देना वर्शी... भगवान ने तुम्हें मेरे लिए एक बेहद खूबसूरत तोहफा बनाकर भेजा था, लेकिन मैं अपने भ्रम में इस बात को समझ ही नहीं पाया।"

वर्शी (मुस्कुराते हुए उसके आँसू पोंछती है): "आप दुखी मत होइए बैरागी। मैं आपके हर सुख-दुख में साथ निभाने वाली अर्धांगिनी बनना चाहती थी, कोई मतलबी लड़की नहीं। मैंने जो कुछ भी किया, सिर्फ आपको पाने के लिए किया और मैं आपको जिंदगी भर बहुत खुश रखूंगी।"

बैरागी: "महादेव के सामने... मैं तुम्हें इस वरमाला के साथ अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करता हूँ।"

Gaon walo ne is rishte ko apnaya
Gaon walo ka pyar


​बैरागी ने वर्शी के गले में वरमाला डाली और उसकी मांग में सिंदूर भर दिया। फिर उसने वर्शी को अपनी बाहों में उठा लिया और उसके पैर जमीन पर ना लगने देते हुए सीधे अपने घर की तरफ चल पड़ा। यह नजारा देखकर पूरे भैरवपुर गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई और रास्ते भर लोगों ने उन दोनों पर फूलों की बारिश की। घर पहुँचकर दोनों ने माता-पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

​बैरागी ने एक अच्छे बेटे और एक सच्चे पति का फर्ज निभाया। उसे वह निश्छल प्यार मिला जो हर किसी को नसीब नहीं होता। उनके इस पवित्र प्रेम को देखकर स्वयं महादेव भी बेहद प्रसन्न हुए और आशीर्वाद के रूप में उन्हें दो जुड़वां बच्चे दिए, जिनका नाम 'शिवांश' और 'लव्यांश' रखा गया। पूरा परिवार सुख-शांति से रहने लगा।

© Copyright: Yesudas


Comments

Popular posts from this blog

పాత టంకు పెట్టె (Part 1)

LAST CIGARETTE (లాస్ట్ సిగరెట్) - భాగం 1

​విరిగిన గడియారం (Tuti Hui Ghadi)