रात के 12:12 बजे

 

​1. करेला का परिचय

​गांव में 'करेला' को ऐसा कोई नहीं था जो न जानता हो। लेकिन यह नाम किसी इज्जत से नहीं, बल्कि नफरत और हिकारत से लिया जाता था। करेला का स्वभाव बिल्कुल एक चालाक लोमड़ी जैसा था—सामने कुछ और बात करना, पीठ पीछे छुरा घोंपना और दूसरों के सामने अच्छा बनने का ढोंग करना। दिनभर शराब के नशे में धुत रहना और रात को घर आकर अपनी बीवी-बच्चों को बेरहमी से पीटना ही उसकी जिंदगी थी।

​गांव के बुजुर्ग अक्सर उसे टोकते हुए कहते थे:

​"करेला, सुधर जा! ये तेरी शराब की आदत एक दिन तुझे किसी बड़ी मुसीबत में डाल देगी।"


​करेला हमेशा की तरह हंसते हुए टाल देता:

​"अरे छोड़ो भी बड़े मियां! मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस करेला को पकड़ना किसी के बस की बात नहीं है।"

लेकिन वह नहीं जानता था कि एक खौफनाक रात उसका इंतजार कर रही थी।


​2. वह सदियों पुराना सूखा कुआं

ठीक रात के 12:12 बजे
पुराना, जर्जर कुआं


​गांव के छोर पर एक सुनसान, कच्चा मिट्टी का रास्ता था, जो सीधे गांव के अंदर जाता था। इस मिट्टी के रास्ते के शुरू होते ही एक सदियों पुराना, जर्जर कुआं था। आज की पीढ़ी ने उस कुएं में कभी पानी नहीं देखा था; वह पूरी तरह सूख चुका था और उसके अंदर सिर्फ एक गहरा, डरावना अंधेरा रहता था। गांव के लोग रात के वक्त उस रास्ते से अकेले गुजरने में भी थर-थर कांपते थे।

​तभी एक रात, वक्त हुआ—ठीक रात के 12:12 बजे। करेला hamesha की तरह शराब के नशे में पूरी तरह धुत, लड़खड़ाते कदमों से उसी मिट्टी के रास्ते पर पैदल चला आ रहा था। चारों तरफ एक अजीब, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था और ठंडी हवाएं चल रही थीं।

​3. काली बकरी का साया

​जैसे ही करेला उस पुराने कुएं के पास पहुंचा, अंधेरे में उसकी नजर एक काली बकरी पर पड़ी। वह बकरी कुएं के ठीक बगल में बिना हिले-डुले खड़ी थी। नशे में धुत करेला की आंखें चमक उठीं। उसने अपने मन में सोचा:

​"वाह! आज तो सोने पर सुहागा हो गया। इतनी रात को सुनसान रास्ते पर मुफ्त का माल खड़ा है। कल तो बढ़िया दावत होगी।"


​वह रेंगते हुए बकरी के पास गया, उसकी पीठ थपथपाई और बोला:

​"आ जा मेरी जान, मेरे साथ चल..."

यह कहकर उसने उस काली बकरी को दोनों हाथों से उठाया और अपने कंधे पर लाद लिया। शुरुआत में बकरी का वजन बहुत हल्का लगा, और करेला खुशी-खुशी गांव की तरफ आगे बढ़ने लगा।


​4. बढ़ता हुआ भारी बोझ

​कुछ ही दूर चलने के बाद, करेला की सांसें फूलने लगीं। उसे महसूस हुआ कि उसके कंधे पर रखी बकरी का वजन धीरे-धीरे बढ़ रहा है। उसने अपने कदम roke, बकरी को थोड़ा संभाला और बड़बड़ाया:

​"ये क्या माजरा है? अभी तो यह बहुत हल्की थी, अचानक इतनी भारी कैसे होने लगी? शायद मैंने आज ज्यादा पी ली है, इसलिए मेरे पैर जवाब दे रहे हैं।"

अगले सौ कदम बढ़ते-बढ़ते, वह वजन दोगुना हो गया
बढ़ता हुआ भारी बोझ


​उसने दोबारा चलना शुरू किया। लेकिन अगले सौ कदम बढ़ते-बढ़ते, वह वजन दोगुना हो गया। करेला की कमर झुक गई और उसके माथे से पसीना बहने लगा। नशे में होने के बावजूद उसके दिल में एक अजीब सी घबराहट और अनजाना डर बैठ गया। फिर भी उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

​5. पुराने पुल के पास खौफ

​चलते-चलते वह गांव के मुहाने पर बने एक पुराने पुल के पास पहुंचा। वहां पहुंचते ही, वह बकरी अचानक एक भारी पहाड़ जैसी हो गई। वह वजन अब करेला के सहने के लायक नहीं था। ऐसा लगा जैसे उसकी हड्डियां अभी टूट जाएंगी। दर्द और डर के मारे करेला जोर से चीखा:

​"अरे बाप रे! मैं तो मर गया! ये कैसी बकरी है भाई... इतनी भारी!"


​अब एक कदम भी आगे बढ़ाना नामुमकिन था। करेला ने अपनी पूरी ताकत लगाई और उस बकरी को जोर से जमीन पर पटक दिया। हांफते हुए जैसे ही वह पीछे मुड़ने लगा, अंधेरे से आई एक आवाज ने उसका खून जमा दिया।

​6. वो खौफनाक आवाज

​जमीन पर गिरते ही वह बकरी इंसानी आवाज में बेहद डरावने और विकृत ढंग से चिल्लाई:

​"बाप रे! मेरेको तो मार डाला रे... करेला भोसड़ीके!"

​"बाप रे! मेरेको तो मार डाला रे... करेला भोसड़ीके
जमीन पर गिरते ही वह बकरी इंसानी


​यह सुनते ही करेला का सारा nasha एक सेकंड में काफूर हो गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और बदन कांपने लगा। उसने बिना पीछे मुड़े, बिना सोचे-समझे, अपनी जान हथेली पर रखकर गांव की तरफ ऐसी दौड़ लगाई कि पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके पीछे उस अंधेरे में एक भयानक, अमानवीय हंसी गूंज रही थी।

​7. साया और श्मशान की नदी

​इस घटना के दो दिन बाद, गांव वालों ने करेला में एक बेहद डरावना बदलाव देखा। वह पूरी तरह से दुष्ट आत्माओं के वश में हो चुका था। करेला को 'मत्कारी' और 'फितकारी' नाम की दो भयानक अतृप्त आत्माओं ने अपने वश में कर लिया था।

​अब हर रात ठीक 12:00 बजते ही करेला की आंखें एकदम लाल हो जातीं और वह पागलों की तरह श्मशान के पास बहने वाली नदी की तरफ भागने लगता। भागते हुए वह लगातार चीखता था:

​"मुझे मत रोको! मेरा बुलावा आ गया है! मैं उस नदी में डूबकर मर जाऊंगा! मुझे जाने दो!"


​गांव के लोग उसे बचाने के लिए उसके पीछे दौड़ते।

​"करेला! रुक जा! कहां भागा जा रहा है? हम तुझे मरने नहीं देंगे!" गांव वाले चिल्लाते।

लोग उसे पकड़कर थोड़ा दूर लाते, लेकिन उन आत्माओं की आसुरी ताकत के आगे सब बेकार था। वह सबको एक झटके में पटककर फिर से नदी की तरफ भाग जाता। दो दिन से गांव में यही तमाशा और दहशत का माहौल चल रहा था।


​8. रुद्र की एंट्री

​जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो गांव वाले हार मानकर 'रुद्र' के पास पहुंचे। रुद्र—जो गांव से दूर अकेला रहता था, hamesha ध्यान में लीन रहता था और जिसे दुनिया की मोह-माया से कोई सरोकार नहीं था।

​गांव वालों ने हाथ जोड़कर कहा:

​"रुद्र! हमारी रक्षा करो। करेला के ऊपर किसी बेहद खतरनाक डायन या भूत का साया है। वह हर रात श्मशान की नदी में डूबने भागता है। हमारी सारी ताकत खत्म हो गई, पर हम उसे रोक नहीं पा रहे।"


​रुद्र शांत कदमों से आया और उसने करेला को ध्यान से देखा। उसकी आंखों में देखते ही रुद्र सब समझ गया और बोला:

​"यह कोई मामूली साया नहीं है। इसके शरीर के अंदर 'मत्कारी' और 'फितकारी' नाम की दो आत्माएं हैं। ये दोनों एक काले साये की मदद से बेहद शक्तिशाली हो चुकी हैं। इनका सिर्फ एक ही मकसद है—इंसान के दिमाग को अपने वश में करना और उसे श्मशान की नदी में डुबोकर मार देना।"


​9. सीमा पर आखिरी जंग

​रुद्र अच्छी तरह जानता था कि इन दुष्ट आत्माओं की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी गर्दन और कान होते हैं। रुद्र ने बिना एक पल गंवाए करेला के कानों को अपनी उंगलियों से जोर से दबोच लिया और उसकी गर्दन को अपने कंधे के बीच कस लिया। वह उसे घसीटते हुए गांव की सीमा की तरफ ले जाने लगा।

​उस वक्त करेला के अंदर बैठी मत्कारी और फितकारी गुस्से से पागल हो गईं। करेला के मुंह से एक खोखली, भारी आवाज निकली:

​"रुद्र! छोड़ दे इसे! यह हमारा शिकार है! अगर तू बीच में आया, तो हम तुझे भी जिंदा दफन कर देंगे!"

 

​रुद्र ने अपनी मानसिक और आध्यात्मिक ताकत को समेटा और गरजते हुए कहा:

​"तुम्हारी चालें मेरे सामने नहीं चलेंगी! आज तुम्हारा खेल यहीं खत्म होता है!"

​रुद्र ने अपनी मानसिक और आध्यात्मिक ताकत को समेटा और
लगातार 3 घंटे

​वह खौफनाक कशमकश लगातार 3 घंटे तक चलती रही। वे आत्माएं करेला के शरीर को पीछे खींचने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही थीं, और रुद्र अपनी दिमागी और आत्मिक शक्ति से उसे आगे खींच रहा था। आखिरकार, रुद्र उसे खींचते हुए गांव की सीमा पर लगे एक बड़े पत्थर के पास ले आया।

​10. मुक्ति और सत्संग

​उस सीमा के पत्थर के पास पहुंचते ही रुद्र ने करेला के कान में जोर से कहा:

​"सुनो मत्कारी-फितकारी! यहां से तुम्हारा नाटक खत्म हो चुका है। इस सीमा के उस पार तुम दोनों कदम भी नहीं रख सकतीं। तुम्हारा किस्सा यहीं खत्म होता है। अगर अब दोबारा गांव में घुसने की कोशिश की, तो तुम्हें श्मशान के जहन्नुम में हमेशा के लिए दफन कर दूंगा!"


​यह सुनते ही करेला का शरीर एक बार जोर से झटका खाया। रुद्र ने उसे पूरी ताकत से धक्का दिया और गांव में ही चल रहे एक सत्संग के बीच में ले जाकर फेंक दिया। सत्संग में हो रहे पवित्र मंत्रों और भजनों की आवाज से वे आत्माएं एकदम पस्त और कमजोर हो गईं।

​ठीक 10 मिनट बाद, करेला को होश आने लगा। उसकी आंखों का लालपन गायब हो गया। वह रोते हुए रुद्र के घुटनों पर गिर पड़ा और बोला:

​"स्वामी! मुझे बचा लीजिए, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। वे आत्माएं आज मुझे मार ही डालतीं!"


​उसी पल, मत्कारी और फितकारी ने आखिरी बार रुद्र पर हमला करने के लिए हवा में रुख किया, लेकिन इस बार पूरे गांव वाले तैयार थे। सबने मिलकर करेला को जोर से दबोच लिया। उस पवित्र माहौल और सामूहिक ताकत के आगे हार मानकर, मत्कारी और फितकारी करेला के शरीर को छोड़कर हमेशा के लिए मुक्त हो गईं और हवा में विलीन हो गईं।

​11. उपसंहार

​वह खौफनाक रात आखिरकार खत्म हुई। रुद्र थका-हारा अपने घर वापस लौटा। लेकिन वह सीधे घर के अंदर नहीं गया। उसने घर के बाहर ही अपने सारे कपड़े उतारे, वहीं कुएं के पानी से नहाकर खुद को पूरी तरह शुद्ध किया, और उसके बाद ही घर के अंदर कदम रखा।

नहाकर खुद को पूरी तरह शुद्ध किया,
नहाकर खुद को पूरी तरह शुद्ध किया,


​करेला की जान तो बच गई थी, लेकिन रात के उस 12:12 बजे के वक्त और उस काली बकरी के खौफ ने उसके दिलो-दिमाग पर ऐसी छाप छोड़ी कि वह जिंदगी भर के लिए बदल गया। उस रात के बाद से करेला ने शराब को कभी हाथ नहीं लगाया और वह एक सुधरा हुआ सीधा-साधा इंसान बन गया।


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