Tuti Hui Ghadi (रुकी हुई घड़ी)
1. टूटी किस्मत और बेरहम अपने
| Kacha badaam ka rastha |
यह कहानी है 'कच्चा बादाम' की, जिसके पास सिर्फ एक टूटी हुई घड़ी, पैर में टूटा हुआ चप्पल और तन पर एक फटा हुआ जेब था। पर इस फटे हुए जेब के पीछे एक ऐसा हौसला था जो कभी हारना नहीं जानता था। कच्चा बादाम अपनी फूटी किस्मत लेकर सितारों की नगरी 'सितार नगर' पहुंचता है। यहां न कोई उसका अपना था, न पराया। घर का बड़ा बेटा होने के बाद भी उसे कभी किसी का साथ नहीं मिला। पैदा होते ही उसके सगे मां-बाप ने उसे चंद रुपयों के लिए बेच दिया था। जिन नेकदिल लोगों ने उसे खरीदा, उन्होंने उसे पाला-पोसा। लेकिन जब वे पालने वाले मर गए, तब सगे मां-बाप उसे 14 साल की उम्र में वापस अपने घर ले आए—पर बेटा बनाकर नहीं, बल्कि एक मुफ्त का नौकर बनाकर।
2. अपनों की क्रूरता - घर छोड़ फुटपाथ पर
घर के छोटे भाई-बहनों को मां-बाप का बेपनाह प्यार मिलता था, उनके हर नखरे उठाए जाते थे। मगर कच्चा बादाम के हिस्से में सिर्फ रूखी रोटी, सूखा दाल और रहने के लिए बदबूदार तबेले का कोना था। वह रात-रात भर जागकर रोता और यही सोचता कि आखिर कोई सगा मां-बाप इतना बेरहम और कठोर कैसे हो सकता है? पर उसने न कभी अपनी फूटी किस्मत को कोसा, और न कभी भगवान से शिकायत की। उसने अपनी इस कड़वी हकीकत को अपना लिया। एक दिन, बिना किसी से अपना हक मांगे और बिना अपने हिस्से का प्यार मांगे, वह अपनी उस पुरानी रुकी हुई घड़ी को लेकर चुपचाप घर से निकल पड़ा। 'सितार नगर' के एक सुनसान फुटपाथ पर, वह कड़कड़ाती ठंड में खाली पेट को अपने दोनों हाथों से भींचकर सो गया।
3. फुटपाथ का हमदर्द और वफादारी का सफर
उस भयानक भूख और बेबसी के हाल में भी कच्चा बादाम के अंदर की इंसानियत नहीं मरी। आधी रात को उसे कहीं से सिर्फ एक सूखी रोटी नसीब हुई थी। उसने जैसे ही उसे खाने के लिए उठाया, सामने एक लावारिस, बीमार कुत्ता आकर बैठ गया। कच्चा बादाम ने आधी रोटी खुद खाई और आधी उस कुत्ते को खिला दी। उसने कुत्ते की बेबस आंखों में देखकर आंसू बहाते हुए कहा—"इस दुनिया में यह बेजुबान और मैं, दोनों एक ही तरह तो हैं। दोनों लावारिस हैं।"
| Footpath par bhooka kutha |
अगली सुबह हुई। कच्चा बादाम अपने पालने वालों की आखिरी निशानी यानी अपनी 'रुकी हुई घड़ी' को कलाई पर बांधकर उस चौक पर पहुंचा जहां हर सुबह गरीब मजदूरों को काम मिलता है। अपनी ईमानदारी और मासूमियत के दम पर उस चौक पर उसे एक बड़े सेठ के यहां मजदूरी का काम मिल गया। अब उसके पास काम था और दिल में पालने वालों की यादें। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, उसकी किस्मत का पहिया भी घूमने लगा। जिसके पास कभी एक रुपया भी नहीं था, वह लड़का अब जी-तोड़ मेहनत करके काम की सारी बारीकियां सीखने लगा। वह अपने सेठ के पास पूरी वफादारी और सच्चाई के साथ रहने लगा। सेठ के हर सुख-दुख में वह साए की तरह उनके साथ खड़ा रहा।
4. 100 करोड़ का साम्राज्य और महा-त्याग
सेठ की अपनी कोई औलाद नहीं थी। उन्होंने सालों तक कच्चा बादाम की वफादारी, उसकी सच्चाई और उसका साफ दिल देखा था। उन्होंने उसे केवल अपना मैनेजर नहीं, बल्कि अपना बेटा मान लिया था। जब सेठ का आखिरी वक्त आया, तो उन्होंने कानूनी तौर पर कच्चा बादाम को अपने 100 करोड़ के पूरे साम्राज्य का असली मालिक और हिस्सेदार बना दिया।
| Kacha badham trust |
आखिरी सांस लेते हुए सेठ ने रोते हुए उसका हाथ पकड़ा और कहा—"बेटा, इस दौलत के घमंड में मत आना। इससे हमेशा उन बेसहारा गरीबों की मदद करना... जो बिल्कुल तुम्हारे जैसे तड़पते हैं।" सेठ के जाने के बाद कच्चा बादाम का दिल टूट गया। उसने उस 100 करोड़ के साम्राज्य को एक नया मोड़ दिया। उसने पूरी कंपनी को एक बहुत बड़े चैरिटी ट्रस्ट में बदल दिया और उसे अनाथ बच्चों तथा बेसहारा बुजुर्गों के नाम कर दिया। सब कुछ दान करने के बाद, वह फिर से अपनी वही 'रुकी हुई घड़ी' उठाकर वहां से जाने लगा—ताकि जिंदगी को फिर से 0 से शुरू कर सके। जाते वक्त वहां के अनाथ बच्चों ने उसका दामन पकड़कर रोते हुए पूछा, "भैया, आप हमें फिर से अनाथ करके क्यों जा रहे हो?" तब कच्चा बादाम ने जाते-जाते वहां लगे एक बड़े बोर्ड पर अपने खून और आंसुओं से जिंदगी का सबसे बड़ा सच लिख दिया:
| Bacho ko likha kar dikhaya |
"क्या पाया था, क्या खोया हूँ, जो पा न सका वो मेरा था और जो पाया हूँ वो मेरा नहीं है। इस साम्राज्य पर अब तुम अनाथों का हक है। मैंने बचपन में परिवार पाया फिर खो दिया, फिर सगा परिवार पाया पर उनका प्यार खो दिया, फिर मैंने पिता जैसा एक और इंसान पाया पर मौत ने उसे भी छीन लिया। मेरी असली खुशी आप सबको अपना परिवार बना कर मिली।"
5. शून्य का सफर और बिका हुआ बचपन
यह दर्दनाक खत लिखकर, वह अपनी टूटी हुई घड़ी, टूटा चप्पल और फटा जेब लेकर उसी तरह अनजान रास्तों पर अकेले निकल गया जैसे सालों पहले आया था। उसने अपने मन में ठान लिया था, "मैं फिर से सब कुछ शून्य से शुरू करूंगा।" वह अपने सगे माता-पिता के हाथों बिकने की चोट खाया हुआ था, फिर उसे पालने वालों के जाने का सदमा मिला, और फिर सगे मां-बाप की नफरत की चोट मिली। उसे जिंदगी में हर तरफ से सिर्फ गहरे जख्म ही मिले थे। अब उसकी जिंदगी में कुछ भी नहीं बचा था, वह फिर से पूरी तरह खाली हाथ और शून्य हो चुका था। अगर उसके पास कुछ बचा था, तो वह थी उसकी कलाई पर बंधी वही पुरानी रुकी हुई घड़ी, जो कभी चलती नहीं थी। अब ना कोई परिवार था, ना कोई ठिकाना; जो कुछ भी उसने कमाया था, सब दूसरों के आंसुओं को पोंछने में बांट दिया था।
6. खाली पेट, बहते आंसू और भीख का रास्ता
| Sab kuch fir zero se shuru |
वह बिना कुछ खाए-पिए तपती धूप और कड़कड़ाती रास्तों पर चलता गया। उसके पैरों के छाले फट चुके थे, चप्पल टूट चुकी थी। वह अपनी मंजिल की तलाश में आगे बढ़ता रहा, लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि उसकी मंजिल कहां है। रास्ते भर पेट की आग को बुझाने के लिए वह भीख मांगते हुए अपनी किस्मत की नई लकीरें खुद लिख रहा था। लोग उसे दुत्कारते, धक्का मारते, पर वह चुपचाप आंसू पोंछकर आगे बढ़ जाता। पूरा रास्ता उसके दिमाग में सिर्फ एक ही दर्दनाक और चुभने वाली सोच घूमती रही कि, "आखिर मेरा कसूर क्या था? हां, मेरी मां ने मुझे सिर्फ इसलिए फेंक दिया और नफरत की क्योंकि मैं घर का बड़ा लड़का था। क्या इस दुनिया में घर का बड़ा लड़का होने के नाते मेरी जिंदगी का ऐसा दर्दनाक होना जायज है? बड़े बेटों की किस्मत में सिर्फ त्याग और आंसू ही क्यों लिखे होते हैं?" इसी गहरे दुख के बोझ तले वह लगातार चलता चला गया।
7. दुनिया का आखिरी कोना और अधूरी शांति
चलते-चलते, महीनों भटकने के बाद, वह इस दुनिया के उस आखिरी कोने, उस वीरान पहाड़ के छोर तक पहुंच गया जहां मानो इंसानी दुनिया का अंत था। उसके आगे सिर्फ गहरी खाई और सन्नाटा था। लेकिन उस आखिरी कोने पर पहुंचने के बाद भी उसके तड़पते हुए दिल को कहीं सुकून नहीं मिला। वह रो-रोकर आसमान से पूछ रहा था कि उसकी गलती क्या थी? वह पैदा हुआ तो उसे मां-बाप ने बाजार में बेच दिया। फिर जिन पालने वालों के पास वह बड़ा हुआ, भगवान ने उनका साथ बीच में ही छुड़ा दिया। सगे माता-पिता ने दोबारा अपनी दहलीज पर बुलाया तो सही, लेकिन कभी बेटे का हक और अपनापन नहीं दिया। वहां से भटका तो एक फरिश्ते जैसे सेठ का साया मिला, लेकिन मौत ने उसे भी छीनकर फिर से अनाथ कर दिया। जो 100 करोड़ की संपत्ति मिली, उसने उसे भी ठुकरा दिया।
8. अंतहीन सफर
| Duniya ka akhri kona |
अब उसके सामने सिर्फ दुनिया का आखिरी कोना था, आंखों में कभी न सूखने वाले आंसू थे, और कलाई पर वही पालने वालों की दी हुई 'रुकी हुई घड़ी' थी। उसका वक्त हमेशा के लिए उस घड़ी की तरह रुक चुका था, लेकिन उसका दर्दनाक सफर अब भी जारी था। वह समझ चुका था कि इस दुनिया में उसके लिए कोई कोना नहीं बना है। वह अपनी टूटी घड़ी को सहलाते हुए, फिर से अनजान और धुंधले रास्तों की तरफ अकेला बढ़ गया। कहानी यहीं पर खत्म हुई, पर कच्चा बादाम का दर्द अमर हो गया।
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