Jeb Mein ₹70 Aur Ek Galat Train: Meri Zindagi Ka Ek Khaufnak Safar (True Story)


​1. 20 साल पहले की शुरुआत

यह कहानी आज से ठीक 20 साल पहले की है। जब मैं सिर्फ 15 साल का था, तब मुझे सीमेंट वर्क का काम करने के लिए भेजा गया था। मेरा नाम येसुदास है और मेरे ठेकेदार का नाम सुब्रमण्यम था। मुझे ₹2000 पगार के लिए वहां भेजा गया था।

​2. दीवार के उस पार का खौफ

वहां 4 महीने काम करने के बाद, एक दिन जब मैं संडे के दिन अपने चचेरे भाई के साथ काम कर रहा था, तो हम एक पुरानी और बंद हो चुकी कंपनी के हिस्से में थे। वहां पास ही में एक दूसरी कंपनी की


दीवार थी, जहां मुझे अचानक एक अजीब सी आहट सुनाई दी। जब मैं उस दीवार पर सीढ़ी लगा कर ऊपर चढ़ा और देखा, तो वहां एक दिल दहला देने वाली घटना का सामना मैंने किया। मैंने देखा कि एक बूढ़ी औरत जमीन पर बैठी हुई है, जिसके बाल सब सफेद थे और उसके दांत बहुत अजीब थे। फिर उसने मेरी तरफ देखा और मैं उसे देखकर 2 सेकंड के लिए बिल्कुल ब्लैंक हो गया।

​3. खौफ का असर और भागने का निर्णय

उस 2 सेकंड के बाद मैंने उसकी नकारात्मक शक्ति को पहचाना, तब तक वह मेरे दिमाग पर असर कर चुकी थी। सीढ़ी टूटने के कगार पर थी, इसलिए मैं उस सीढ़ी से कूदकर भैया के पास दौड़ा। भैया ने मुझे धैर्य दिया, फिर हम दोनों ने उसी वक्त जो मसाला मिक्स किया हुआ था, उसे खत्म किया और वापस अपने रूम पर चले गए।

​उसके अगले दिन से मुझे हर रोज सुबह-सुबह सिर के एक तरफ का दर्द होना शुरू हुआ। हर रोज मेरे से दर्द बर्दाश्त के बाहर हो रहा था। हर सुबह और दोपहर के खाने में ठेकेदारिन सिर्फ हरी मिर्च की चटनी ही भेजती थी। ऊपर से यह सिर दर्द! मैंने ठेकेदार को बताया, भैया को बताया, पर कोई इस बात को नहीं समझ रहा था। जैसे-तैसे मैंने दिनचर्या शुरू की, पर यह सिर दर्द शाम होते ही खत्म हो जाता था। जब मैं दर्द की वजह से काम में नहीं जा पाता, तो लोग मुझे बुरा-भला कहते थे। इस सब से तंग आकर मैंने एक हफ्ते बाद वहां से भागने का निर्णय ले लिया।

​4. जेब में ₹70 और एक गलत ट्रेन

उस समय मेरे पास पैसे बहुत कम थे, सिर्फ ₹70 मेरी पॉकेट में थे। मुझे नहीं पता था कि कैसे घर पहुंचूं, पर मुझे लगा कि कम्बम (Cumbum) तक मैं इस पैसे से पहुंच सकता हूं। मैं सिकंदराबाद स्टेशन गया और वहां से कम्बम का टिकट कटवाया। पर ट्रेन की समझ ना होने के कारण, मैं कम्बम की बजाय खम्मम (Khammam) की गाड़ी में चढ़ गया। दोनों का नाम एक जैसा होने के कारण मुझे कुछ समझ में नहीं आया। ₹40 का टिकट मिला था और पॉकेट में अब सिर्फ ₹30 बचे थे। मैंने सोचा था कि मैं इस बचे हुए ₹30 से कैसे भी कम्बम से कनिगीरी (Kanigiri) आराम से पहुंच जाऊंगा।

​5. अपनी भूख से बड़ी एक मासूम की भूख

उस वक्त मुझे घर जाने की खुशी भी थी और पीछे छूटे उस डर का एहसास भी। रात का समय था, इसलिए धूप ना होने की वजह से मेरा सिर दर्द भी नहीं था। मैंने आगे-पीछे कुछ नहीं सोचा और जनरल डिब्बे में बैठ गया, और सफर शुरू हुआ। चलते-चलते मुझे तेज भूख लगने लगी, मैंने सोचा ₹30 में से समोसा खरीद कर खा लूं। पर तभी मेरे सामने एक छोटी बच्ची बैठी थी। मुझे लगा कि वह भूखी है, और उसको देखकर मुझे मेरी भूख


से बढ़कर उसकी भूख लगी। मैंने ₹15 के समोसे लिए और उस बच्ची को खिला दिया। उसके बाद मैं ऐसे ही भीड़ में सो गया।

​6. अनजान शहर और एक फरिश्ता

सुबह जब मेरी आंख खुली और मैंने बाहर देखा, तो मैं खम्मम में था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं ट्रेन से उतरा और हैरान रह गया। मैं स्टेशन पर सबसे पूछने लगा कि यहां से कनिगीरी के लिए बस कहां से मिलेगी? मैंने बहुत लोगों से यह बात पूछी, पर स्टेट्स अलग होने के नाते किसी ने वह नाम सुना ही नहीं था। लोग कनिगीरी को 'कालीगिरी' कह रहे थे। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं।

​7. विजयवाड़ा का संघर्ष और खुद्दारी

मैंने उसी भूख के साथ विजयवाड़ा का सफर शुरू किया। रात के ठीक 7 बजे मैं विजयवाड़ा पहुंच गया। वहां पहुंचने के बाद मुझे भयंकर भूख लगने लगी थी, तो मैंने भीख मांगने के बजाय काम करके पेट भरने का जरिया ढूंढा। वहां माल-गाड़ी में कुछ लोग सामान लोड कर रहे थे। मैं उनके पास गया और काम मांगा। पर उन लोगों ने कहा, "रात भर काम करो, ₹40 दूंगा।" मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ, पर मैंने अपनी खुद्दारी छोड़कर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाए।

​मैं वहां से कृष्णा नदी चला गया। वहां भी खाने को कुछ नहीं मिला। मैं उस नदी की रेत (sand) पर रात भर सोया। सुबह उठकर वही नदी का पानी पिया और अपने बचे हुए पैसों से कैसे भी करके ओंगोल पहुंचा।

​8. जिंदगी का सबसे कीमती ₹1 का कॉइन

ओंगोल पहुंचकर मेरी पॉकेट में आखिरी ₹1 बचा था। मैंने वहां एक ₹1 के कॉइन बॉक्स से अपने पापा को कॉल किया और उन्हें पूरी बात बताकर बुला लिया। फिर पापा आए, उन्होंने मुझे पेट भर कर खिलाया और गले से लगा कर घर ले गए।

​मेरा वह आखिरी बचा हुआ ₹1, जिसे मैंने कॉइन बॉक्स


में इस्तेमाल किया, उस एक रुपये से मैंने जिंदगी के आखिरी पलों को समझा और महसूस किया। यह मेरी जिंदगी के कभी ना भूलने वाले पल थे, जिन्होंने मुझे आज एक मजबूत इंसान बनाया है।


​Copyright © 2026 Yesudas. Is sachi kahani ke sabhi adhikar surakshit hain. Bina anumati ke iska upyog kanoonan apradh hai.

Comments

Popular posts from this blog

పాత టంకు పెట్టె (Part 1)

LAST CIGARETTE (లాస్ట్ సిగరెట్) - భాగం 1

​విరిగిన గడియారం (Tuti Hui Ghadi)