भगवानों का बाज़ार और मैं: इंसानियत का एक कड़वा सच
"हाँ, मैं एक इंसान हूँ... हाँ, मैं एक इंसान हूँ, दुनिया की सबसे तेज़ नस्ल... सबसे उच्च नस्ल!"
हम अक्सर खुद को दुनिया की सबसे बेहतर और समझदार नस्ल कहते हैं, पर क्या हम सच में ऐसे हैं? आइए आज खुद के पाखंड और दोगलेपन को इस आईने में देखते हैं।
1. भगवानों के बाज़ार में मार्केटिंग
मैं अपनी सुविधा के हिसाब से धर्म का पालन करता हूँ, धार्मिक हो जाता हूँ जब मुझे ज़रूरत होती है। मैं भगवान के साथ भी समझौता (Deal) करता हूँ, धर्मों के साथ मार्केटिंग करता हूँ। भगवानों के इस बाज़ार में, मैं वही इंसान हूँ जो खुद को दुनिया की सबसे बेहतर नस्ल कहता है, सबसे उच्च कहता है... इंसान हूँ मैं, ऐसा ही हूँ। जब तक अपना काम न निकलवाना हो, हमें भगवान याद नहीं आते।
2. क्या माँ के पेट में मज़हब लिखा था?
इसीलिए कहता हूँ कि मैं कैसा इंसान हूँ? क्या जब मैं माँ के पेट में था, तब वहाँ मेरा मज़हब लिखा गया था? क्या सूरज की रोशनी मेरा धर्म और मज़हब देखकर मुझ पर रोशनी देती है? बहती हुई हवा कभी मेरी जाति नहीं पूछती, प्यास बुझाने वाला पानी मेरी प्रजाति देखने नहीं आता। यहाँ तक कि जब मुझे भूख लगती है, तो मेरे पेट में जाने वाला अन्न का एक-एक निवाला भी मेरा मज़हब नहीं पूछता... फिर भी मैं दूसरों का 'कास्ट सर्टिफिकेट' माँगता हूँ। हाँ, मैं इंसान हूँ! जब यह पूरी कायनात और प्रकृति मुझसे कोई भेद नहीं करती, तो मैं कौन होता हूँ लोगों को बाँटने वाला?
3. ममता का मोल और कसाई का धंधा
इंसान हैं हम, यहाँ कोई गाय को 'माता' कहता है तो कोई उसे बेरहमी से काट देता है। क्या इंसान को उसके दूध की ममता दिखाई नहीं देती? जब गाय, भैंस, भैंसी, बकरा या बकरी को काटा जाता है और फिर उसी को देवी-देवता मानकर पूजा जाता है... तो जो काटता है वह तो कसाई होता है, पर जो उसे (काटने के लिए) बेचता है, वह कौन होता है?
| kasai ka dhanda |
और जब हम कुत्ते को
'गौरी माता' मानते हैं, कभी-कभी उसको भी पूजते हैं, तो क्यों हम कभी-कभी उसी को लात मारते हैं? 'चल हट' बोलकर उसको गाली देते हैं। कभी अचानक हमारे अंदर की इंसानियत जाग जाती है, तो हम बाज़ारों में चलते-चलते, चार लोग देखते हुए उनको खाना खिला देते हैं। फिर बाद में जब वही कुत्ता गंदा दिखता है, तो उसी को गाली बकते हैं, उसी को लात मारते हैं। हम कैसे इंसान हैं? क्या हमारे अंदर कोई इंसानियत जागी भी है? कोई इंसानियत थोड़ी-बहुत बची भी है कि नहीं?
4. मंदिर के बाहर का सच और भगवानों का बँटवारा
देखो, रास्ते में चलते-चलते मंदिर आता है, तो हम चप्पल उतारकर, हाथ जोड़कर नमस्ते-नमस्कार कर लेते हैं। और जब उस मंदिर से थोड़ा दूर चले जाते हैं, तो कोई भिखारी अगर कुछ माँगता है, तो उसको एक फूटी कौड़ी तक नहीं देते। गरीब को भूखा देख सकते हैं, लाचार को लाचारी में देख सकते हैं, किसी भी इंसान को कष्ट और बेहद दुख में देख सकते हैं... फिर भी हम हाथ जोड़कर भगवान से मार्केटिंग करते हैं!
फिर क्यों भगवान से हम मार्केटिंग करते हैं? बताओ, सोचो। यह तो सोचने की बात है। हम पैसा इकट्ठा करते हैं, माहौल बनाते हैं, फिर कहते हैं—'प्यार से रहो'। और फिर हम अगले ही पल उस प्यार को छोड़ देते हैं। जब हम इतना सब कुछ करते हैं, तो ये भगवान, वो भगवान, वो भगवान, ये भगवान बोलकर भगवानों को क्यों हम बाँटते हैं? जो भी भगवान हो, जो भी हो, जैसा भी हो... हर भगवान, हर धर्म, हर मज़हब तो यही कहता है न कि 'हाँ, इंसान के अंदर हूँ मैं'। तो फिर उस बात को हम कैसे भूल जाते हैं? हाँ, मैं इंसान हूँ।
5. प्रकृति का विनाश और हमारा अंतर्विरोध
मैं कहता हूँ कि पेड़ों को बचाओ, उसकी हवा चाहिए, उसकी प्रकृति चाहिए... और मैं वही इंसान हूँ जो उसी पेड़ को चूल्हा जलाने के लिए काटता हूँ। हाँ, मैं वही इंसान हूँ जो उसी पेड़ को बेचने के लिए काटता हूँ। अगर पेड़ 400 साल पुराना भी हो, और वहाँ मुझे कोई प्लॉट या मॉल बनाना हो, तो मैं उसे बिना सोचे-समझे काट देता हूँ। और फिर खुद ही ज़ोर-शोर से कहता हूँ—'प्रकृति बचाओ!'
हाँ, मैं इंसान हूँ... उच्च, श्रेष्ठ, उत्तम! भगवान का बनाया हुआ वो जीव, जो भगवान की बाकी बनावटों का कोई मोल नहीं रखता। मैं कौन हूँ? क्या कभी मैंने खुद के अंदर झाँककर उस 'शून्य' को महसूस किया है, जिसे हम आज भगवानों के अलग-अलग नामों से बाँटते फिरते हैं? हाँ, मैं इंसान हूँ...
कॉपीराइट © येशुदास (Yesudas) | सर्वाधिकार सुरक्षित
Comments
Post a Comment