​श्मशान में आत्माओं की घोषा (भाग 3)

 

Rudra aur athmao ki ghosha
Rudra aur ghosha

​नदी के उबलते पानी और उस डरावनी परछाई के बीच फंसा रुद्र जैसे ही आगे बढ़ने लगा, कहानी ने एक ऐसा खौफनाक मोड़ लिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी:

1. घोषा की फ्रिक्वेंसी और असली

Athamao ki friquances
Ghosha ki fricauance



​जैसे ही रुद्र का पैर नदी के ठंडे पानी को छूने वाला था, मोटुपल्ली श्मशान से वही रहस्यमयी 'घोषा' (आवाज) बहुत तेज तरंगों के साथ गूंज उठी। इस बार अमित और रुद्र ने डरने के बजाय उस आवाज की फ्रिक्वेंसी को ध्यान से समझने की कोशिश की। उस फ्रिक्वेंसी को समझते ही दोनों के होश उड़ गए! कामिनी जिसे रुद्र अब तक अपनी रक्षक शक्ति मान रहा था, वह असल में एक क्रूर यक्षिणी थी जो अच्छा बनने का नाटक करके रुद्र को यहाँ उसकी बलि देने के लिए खींच लाई थी।

2. शिवगणों का सुरक्षा कवच



Shiva gan aur suraksha
Shiva gan



​इस सच के सामने आते ही श्मशान का रहस्य भी खुल गया। वहाँ दिखने वाले साए कोई आम भूत-प्रेत नहीं, बल्कि खुद भगवान शिव के गण (शिवगण) थे। यही वजह थी कि मोटुपल्ली श्मशान से हमेशा रुद्र को आगाह करने के लिए 'घोषा' सुनाई देती थी। जैसे ही यक्षिणी का भांडा फूटा, शिवगण रुद्र को बचाने के लिए आगे आ गए और उन्होंने यक्षिणी को चारों तरफ से घेर लिया।

3. गुप्त माला और देवदार की लकड़ी का रहस्य

​यक्षिणी को हराने का पड़ाव यह था कि रुद्र के तन (सीने) के भीतर छिपी एक प्राचीन जादुई माला को बाहर निकाला जाए। शिवगणों और अमित की मदद से वह दिव्य माला रुद्र के शरीर से बाहर आ गई। लेकिन यक्षिणी का अंत करने के लिए एक और गुप्त चीज की जरूरत थी। अमित को याद आया कि उसकी पुरानी गाड़ी के टूल बॉक्स में सालों से एक चमत्कारी बाबा की दी हुई देवदार की लकड़ी पड़ी थी। 

Amantrith lakdi
Devadar lakdi



अमित बिजली की तेजी से भागकर वह अभिमंत्रित लकड़ी निकाल लाया। नियम के मुताबिक, उस लकड़ी और जादुई माला को मिलाकर यक्षिणी के सिर पर थापा (प्रहार) मारना था।

4. यक्षिणी का अंत और अंतिम बलिदान

Kamini yakshini ka anath
Yakshini ka anth



​रुद्र ने पूरी ताकत से माला और देवदार की लकड़ी को मिलाकर यक्षिणी के सिर पर दे मारा। एक जोरदार धमाका हुआ और वह यक्षिणी अपनी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होकर, सकारात्मक ऊर्जा में बदलकर ब्रह्मांड में विलीन हो गई। लेकिन जाते-जाते, उस आखिरी पहलू में उसने गुस्से में चिल्लाकर कहा—"जान नहीं, तो पैर ही सही!" और उसने पूरी ताकत से रुद्र के बाएं पैर (Left Leg) पर वार किया। यक्षिणी का अंत तो हो गया, लेकिन रुद्र का बायां पैर टूट गया, जो बाद में चिकित्सा के बाद भी सिर्फ आधा ही जुड़ पाया। रुद्र के बाएं पैर के इस बड़े बलिदान के साथ श्मशान में आत्माओं की घोषा की यह कहानी हमेशा के लिए खत्म हो गई।

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